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29 अगस्त 2026

काल स्‍वयं परिवीक्षा है

गीतिका 
छंद- आँसू
विधान- 14 मात्रा, यति अंत में। अंत गुरु से।
पदांत- है
समांत- ईक्षा

हर दिन एक परीक्षा है।
इसमें मिले न दीक्षा है।

बचपन और जवानी का,
काल स्‍वयं परिवीक्षा है।

मानव के हाथों में ही,
संयम और तितीक्षा है।

दुख की नही मात्र सुख की,
रहती सदा प्रतीक्षा है।

कर्म और संस्‍कारों से,
होती सदा समीक्षा है।

दीक्षा- गुरु मंत्र; परिवीक्षा- प्रशिक्षण; तितीक्षा- सहनशीलता   

28 जुलाई 2026

बरसात की झड़ी अब

गीतिका

छंद- दिग्‍पाल 

मापनी- 2212 122 2212 122
पदांत- रही हैं
समांत- अगा
बरसात की झड़ी अब, गर्मी भगा रही है।
ठंडी हवा सभी की, खुशियाँ जगा रही है।1।
हैं दूर तक ढकी इक, जल से भरी घटा भी,
बचती तड़िल्लता से, फेरे लगा रही है।2।
बच्चे घरों के' बाहर, ले कागजों की कश्ती,
तैरा रहे मगर कुछ, वर्षा ठगा रही है।3।
पेड़ों की’ डालियों पे, झूलें खगों की’ टोली,
दादुर हैं चुप मगर पिक, मल्हार गा रही हैं।4।
‘आकुल’ न छत न घर हैं, मुश्किल सदा उन्हीं की,
बरसात हर दफा ही, करती दगा रही है।5।

11 जून 2026

आओ मेघा हरियाली मरु में लाओ

गीतिका
छन्द- रास
विधान- 22 मात्रीय सम मात्रिक छन्द- 8,8,6 पर यति।
अपदान्त
समान्त- आओ

आओ मेघा, हरियाली मरु, में लाओ।
हर घर, जन पथ, वृक्षावलियों, पर छाओ।1।

कहीं नौतपा, विक्षोभों की, मार कहीं,
उमस, आँधियों, लू से राहत, दे जाओ।2।

खेलेंगे हम, बच्चे कैसे, भू तपती,
धरती को भी, थोड़ी ठण्डक, पहुँचाओ।3।

खेत बाग जन जन के चेहरे, मुरझाए,
नयी ताजगी, भर दो अब ना, तड़पाओ।4।

आए तो हो, शुष्क बने तुम, भी देखो,
भीषण लू में, अपने पर मत, झुलसाओ ।5।

वृक्ष बनेंगे, तब ही पौधे, जल बरसे,
जाओ जलधर मेघवलियों सँग आओ ।6।

तन मन हरसे, बाग सघन वन बन जायें,
इतना बरसो कूप ताल सर छलकाओ।7।

9 जून 2026

सर्वधर्म समभाव बना कर रहना चाहिए

 गीतिका

छन्द- गगनांगना
विधान- 25 मात्रीय, 16, 9 पर यति, अन्त 212
पदान्त- चाहिए
समान्त- अहना
सर्वधर्म समभाव, बना कर, रहना चाहिए ।
स्वस्थ रहें हम, कष्ट पालना, सहना चाहिए ।
खान-पान पर अब आवश्यक, प्रथम लगाम हो ,
स्वच्छ हो, न अब हवा प्रदूषित, बहना चाहिए ।
निकलें तभी, जरूरी हो जब, बाहर काम से,
दुर्घटनाएँँ, कम हों सबसे, कहना चाहिए ।
स्वर्ग यहीं, यदि बचे रहोगे, सब यह ठान लें,
नहीं दुराग्रह, नहीं हठाग्रह, दहना चाहिए ।
चलें सुरक्षित, धीमे वाहन, चला रहें सजग,
कहीं न घर अब, कुछ आलस में, ढहना चाहिए ।।

24 मई 2026

मार्ग मध्यम ही करें सारे ग्रहण माँ शारदे

छंद- गीतिका
मापनी- 2122 2122 2122 212  
पदान्‍त- माँ शारदे
समान्‍त– अरण

पट नयन खोलूँ सदा कर के स्‍मरण माँ शारदे।
फिर करूँ खटकर्म सारे संस्‍करण माँ शारदे।

पुष्‍प अर्पण नित्‍य करता शांति का आह्वान भी,
हों प्रकृति के प्रति सजग यह मनहरण माँ शारदे ।  

जान कर अनजान बन कर हो न जाए कर्म जो,
चिह्न दे जाए अमिट कोई न व्रण माँ शारदे ।

पार भव सागर करूँ बस नाम लेकर आपका,
दो करूँ सत्‍कर्म ऐसा आचरण माँ शारदे।

लेखनी को धार दो, मैं लिख सकूँ रचना वही,
सब करें पढ़ कर जगत् में अनुसरण माँ शारदे।

आजकल सब हैं दुखी उलझे हैं मकड़जाल में,
मार्ग मध्यम ही करें सारे वरण माँ शारदे ।

आज ‘आकुल’ भी घिरा है बीच ऊहापोह में,

बच रहा हूँ आज तक ले कर शरण माँ शारदे। 
-आकुल
मध्यम मार्ग-गवान बुद्ध द्वारा दिया गया जीवन का एक संतुलित दृष्टिकोण है। यह किसी भी समस्या या जीवन शैली में "अति" (Extreme) से बचने की शिक्षा देता है।

22 मई 2026

जिस पर बीती मित्र, आफतें वह ही जाने

छंद- रोला

अपदांत

समांत- आने

 

जिस पर बीती मित्र, आफतें वह ही जाने। होनी टले न घात, कह गए सभी सयाने। बिल्ली काटे मार्ग, कहीं पर रोये कुत्ता, छींकें जाते वक्त, अपशगुन है पहचाने। बोले काक मुँडेर, अतिथि या खबर मिले शुभ, दिखे सगर्भा नार, अशुभ हैं घर से जाने। लप लप करती जीभ, साँप की भाँति किसी की, है ना करने योग्‍य, भरोसा, मित्र बनाने। 'आकुल' का है मात्र, यही कहना सब समझो, प्रकृति दत्त ये सीख, यूँ ही' दुनिया ना माने।

 

17 मई 2026

ये रात भी हसीं है चंदा भी’ मुस्‍कुराए

छंद- दिग्‍पाल (मानीबद्ध / मात्रिक)
मापनी- 221 2122 221 2122
अपदांत
समांत- आए

ये रात भी हसीं है चंदा भी’ मुस्‍कुराए।
चंदा व चांदनी से धरती भी’ जगमगाए ।।

देखे चकोर चाहे चंदा से हो मिलन अब,
है हौसले न कम पर सागर भी’ छू न पाए।

कैसा जुनून है यह, मन जो रहे न काबू,
बेमौत ही पतंगा तो जान तक गँवाए।।

इनसान भी कहाँ है पीछे रहे यहाँ पर,
जिसने मुहब्बतें कीं, इतिहास हैं बनाए।

‘आकुल’ न कर सका यह इसका न रंज उसको,
क्‍यों रूप रँग बदलता नित राज़ ये बताए ।।  

10 मई 2026

माँँ तो केवल माँँ होती

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#मातृ_दिवस विशेष समारोह

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गीतिका

सर्वोपरि ममता में माँ।
धीरज में क्षमता में माँ।1।

बन्द सदा रखती मुट्ठी,
उत्तमता, समता में माँ।2।

साख बनाई बरकत से,
जीती कायमता में माँ।3।

मन मारा हरदम उसने,
खुश है मद्धमता में माँ।4।

माँँ तो केवल माँँ होती,    
सच की आगमता में माँ।5।

आगमता- प्रामाणिकता

1 मई 2026

कभी जब मेघ बेमौसम बरस पानी बहाते हैं

गीतिका
छंद- विधाता
मापनी- 1222 12222 12222 1222
पदांत- हैं
समांत- आते

कभी जब मेघ बेमौसम बरस पानी बहाते हैं।
कहीं फसलें उजड़ती हैं कहीं मुसकान लाते हैं।1।

हवाएँ भी वजह बनतीं, न होती कम तपिश जब भी,
कभी इनकी बदौलत मेघ वापिस लौट जाते हैं।2।

न विक्षोभों न लू के ही थपेड़ों से मिली राहत,
कहीं तूफान बन जाते, कहीं दहशत बढ़ाते हैं।3।

हवा सूरज जमाने से अदावत पालते आए,
मगर ये मेघ ही हैं जो सदा आशा जगाते हैं।4।

चलो वृक्षों से करते हैं सभी अब मित्रता ‘आकुल’,
यही हैं जो हवा, सूरज व मेघों को झुकाते हैं।।5।।


27 अप्रैल 2026

कहता रहा मन बाँध ले, गठरी चलें अब गाँव

 गीतिका 
छंद- मणिमाल
मापनी- 11212 11212 11212 1121
अपदांत
समांत- आँँव

कहता रहा मन बाँध ले, गठरी चलें अब गाँव।
शहरी नहीं अपने सगे, सब व्यर्थ के हर दाँव।

हर बात पे अहसान की, छवि झूठ के दस बोल,
बिन पेड़ के पथ दूर तक, मिलती नहीं कुछ छाँव।

कम बोलतीं पिक और हैं, कम हो रहे खग शोर,
हर ओर कूकर साँड के, जमने लगे अब पाँव।

इतना लगा बिन वृक्ष ही, सब आज के परिणाम,
कल धूप भीषण हो मिले, चल छोड़ के अब ठाँव।

मत छोड़ के घर बार जा, यह ही है ‘आकुल’ स्वर्ग
समझे न क्यों तब काक था, कहता रहा कर काँव।

26 अप्रैल 2026

चले बिन मंजिलें मिलती, नहीं बातें बनाने से

 गीतिका
छंद- विधाता
मापनी- 1222 1222 1222 1222
पदांत- से
समांत- आने

न बागों ने कभी की है शिकायत ही जमाने से।

सदा महके प्रकृति से पा हवा पानी व दाने से।

 

बुलाया कब शजर ने आदमी को छाँव में अपनी,

न तरुवर ने कभी रोका किसी को पास आने से।

 

नहीं इनसान दे पानी हवा या खाद बागों को,

उन्‍हें पावस पिलाते हैं अमिय खुल के खजाने से।

 

अगर करता रहे रक्षा सदा पेड़ों व बागों की,

सदा राहत मिलेगी आपदाओं में बचाने से।


नहीं रहना है निर्भर आज हैं हालात बारूदी,

वही इनसान है सम्‍हले तुरत आगाह पाने से।।

 

कभी बैठे रहे भूलो इसे, पर अब उठो जागो,

चले बिन मंजिलें मिलती, नहीं बातें बनाने से।।

 

न हो कल भी हमारा जंग के हालात के जैसा,

यही वो आग है ‘आकुल’ भड़कती है बुझाने से।।

24 अप्रैल 2026

हर मौसम के अपने गुण है

 गीतिका
प्रदत्त छंद- लावणी/ ताटंक
विधान- 30 मात्राा, 16, 14 अंत तीन गुरु।
प्रदत्त पदांत- है
प्रदत्त समांत- आता

हर मौसम के अपने गुण है सबको तभी लुभाता है।
मिल जाये मनभाया उसका जैसे दिल खिल जाता है।

गरमी सरदी वर्षा पतझड़ मधुऋतु भी दी मानव को,
इसमें आते ढेरों पर्वोत्सव सब सहज मनाता है।

सुख-दुख, धूप-छाँव के जैसे आते हैं चल देते हैं,
प्रकृति सदा संकट को टाले मनव से जो नाता है।

इसी तरह चलता है जीवन धरती पर हर प्राणी का,
सक्षम बनना है हरसूरत मौसम हमें सिखाता है।

जीव दया सर्वोपरि सेवा बन निर्बल का संबल तू,
दिये प्रकृति ने खोल हाथ बन सक्षम तू तो दाता है।।

22 अप्रैल 2026

पेड़ बचाएँ नही छोड़ना, उनको अपने हाल पर

गीतिका

छंद- मरहट्ठा माधवी

विधान- 29 मात्रीय छंद जिसमें 16, 13 पर यति अंत 212 (रगण) अनिवार्य।

अपदांत

समांत- अर

लेते हैं साँसें ये भी अरु, देते हैं नि:श्वास भर।

पेड़ बचाएँ नही छोड़ना, उनको अपने हाल पर।


हरियाली या हरित चित्र जैसा भी तुम बस ढाल लो,

वृक्ष झूमते हैं हर झौंके पर हो तो यह ध्यान धर।


करें समर्पित तन मन रोम-रोम अपना ये धरती को,

नंदनकानन यही बनाते हैं निसर्ग, संथाल, घर।


विकसित मरुउद्यान करें ये, ही यदि हम सब सोच लें।

हर प्राणी पाले इनको हम, जैसे पालें जानवर।


आकुलकी है सोच यही बस पेड़ों का संरक्षण हो,

श्रीगणेश कर भृगु, दुर्वासा, ऋषियों का आह्वान कर।।

- आकुल


भृगु ऋषि- ये नदियों और वनस्पतियों के रक्षक माने जाते हैं

ऋषि दुर्वासा- ने कल्पवृक्ष की रक्षा के लिए उसके नीचे बैठ कर तपस्या की थी।

20 अप्रैल 2026

जिद्दी नहीं पिघलते उनका नसीबा

 गीतिका
छंद- वसंत तिलका  (वार्णिक)
मापनी 221 211 121 121 22
पदांत- उनका नसीबा
समांत- अलते

जिद्दी नहीं पिघलते उनका नसीबा।
आँखें सदा बदलते उनका नसीबा।

होते कई गुनहगार न मार से भी,
बोलें न ही बहलते उनका नसीबा।

खर्चे करें अधिक है कम आय तो भी,
ले ले उधार पलते उनका नसीबा।

बैठे रहें पर नहीं रुकती जुबाँ है ,
बोले बिना न चलते उनका नसीबा।

ना हो सही समय ‘आकुल’ छूट जाते,
मौके कभी फिसलते उनका नसीबा।     

17 अप्रैल 2026

हेे वागीशा, हंस वाहिनी, वीणापाणि, माँँ सरस्‍वती

गीतिका 
छंद- लावणी
पदांत- 0
समांत- अती

हे वागीशा हंसवाहिनी,वीणापाणि माँ सरस्‍वती।
श्‍वेत पुष्‍प चरणों में अर्पित, माँ स्‍वीकारों है विनती।

माते है साष्‍टांग दंडवत, निर्मल मन मेरा कर दो,
बुद्धि प्रखर हो ऐसा वर दो, कभी न मुझसे हो गलती।

गति जीवन की हो निर्बाधित, चलती रहे लेखनी बस,
समय कठिन हो कण्‍टकीर्ण पथ, साँसें तुझे रहें भजती।

ना दुर्वचन कहे जिह्वा ना आए ही दुर्भाव कभी,
जीवन हो निष्‍काम कर्म को सदा समर्पित हो हसती।

सबको ही सद्बुद्धि मिले माँ, हे पद्मजा प्रगति श्रेया,
आकुल का मन हो जाए माँ गंगा-यमुना-सरस्‍वती।

13 अप्रैल 2026

जैसी करनी वैसी भरनी है

गीतिका 
मापनी- 222 222 222 // 22 22 22 22 2   

जैसी करनी वैसी भरनी है।
काल परिस्थितियों से बननी है।

मौसम के प्रतिकूल चले जो भी,
तबियत अकसर तभी बिगड़नी है।

कम खा गम खा हद में रहना ही,
वर्ना तो बस चिंता बढ़नी हैं।

बस में है अपने केवल करना,
बाकी तो ईश्‍वर की चलनी है।

क्‍यों ना ऐसे जीवन जियें सभी,
नहीं प्रकृति से कोई ठननी है।। 

11 अप्रैल 2026

घर में रहती शांति, मिल जुल कर हम यदि रहें

छंद- सोरठा 
विधान- दोहे का हूबहू विपरीत यानि 11, 13 पर यति। 
अपदांत 
समांत- ऊकारांत इए 

गीतिका
फूले मगर न श्‍वास, धीरे धीरे घूमिए।
मन का बनें न दास, करना योग न भूलिए।

घर में रहती शांति, मिल जुल कर हम यदि रहें,
रहती कभी न भ्रांति, नहीं बड़ों से रूठिए। 

बच्‍चे वृद्ध जवान, घूमें नित्‍य शाम सुबह,    
घूमें उस दौरान,  कई समस्‍या बूझिए।।

आता सबका दौर, कभी न हारें उम्र से,
करना यह भी गौर, खुशियों को बस ढूँढिए।

जीएँ रख विश्‍वास, मरना शाश्‍वत सत्‍य है,
कर जायें कुछ खास, फिर जीवन से छूटिए।।

सबका रखना मान, सुख-दुख तो मेहमान हैं,
जिएँ सदा यह जान, समदर्शी बन पूजिए ।।

छल प्रपंच से दूर, ‘आकुल’ की यह सीख रह,
क्‍यों कर तनिक सबूर, खुद से थोड़ा पूछिए ।। 

यह विभीषिका युद्ध की देती है संदेश

 मुक्‍तकंठा छंद

(ईरान-इजरायल-अमेरिका युद्ध पर)

1
यह विभीषिका युद्ध की, देती है संदेश।
प्रकृति करेगी संतुलन, छोड़ा मार्ग न लेश ।।
बाढ़, आपदा, रोग, क्षति, आवासन सब ध्‍वस्‍त,
ले डूबेगी सम्‍पदा जिसके लिए ये’ क्‍लेश ।।
जिसके लिए ये’ क्लेश, रह रहा किस भ्रम में वह ।
छीन शांति अरु चैन, न ‘आकुल’ मिलनी है यह ।।

2
वैसे भी जीवन रुका, रुके सभी अभियान ।
सभी योजनाएँ रुकीं, नष्‍ट सभी अनुमान ।।
यह विभीषिका युद्ध की, हुई भयावह रोज़,
पहुँचें अपने घर सभी, यह ही बस है ध्‍यान ।।
यह ही बस है ध्‍यान, बचे जीवन कैसे भी ।
कर लेंगे संघर्ष, बचा है क्‍या वैसे भी ।।