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29 अगस्त 2026
काल स्वयं परिवीक्षा है
28 जुलाई 2026
बरसात की झड़ी अब
गीतिका
छंद- दिग्पाल
11 जून 2026
आओ मेघा हरियाली मरु में लाओ
अपदान्त
समान्त- आओ
आओ मेघा, हरियाली मरु, में लाओ।
हर घर, जन पथ, वृक्षावलियों, पर छाओ।1।
कहीं नौतपा, विक्षोभों की, मार कहीं,
उमस, आँधियों, लू से राहत, दे जाओ।2।
खेलेंगे हम, बच्चे कैसे, भू तपती,
धरती को भी, थोड़ी ठण्डक, पहुँचाओ।3।
खेत बाग जन जन के चेहरे, मुरझाए,
नयी ताजगी, भर दो अब ना, तड़पाओ।4।
आए तो हो, शुष्क बने तुम, भी देखो,
भीषण लू में, अपने पर मत, झुलसाओ ।5।
वृक्ष बनेंगे, तब ही पौधे, जल बरसे,
जाओ जलधर मेघवलियों सँग आओ ।6।
तन मन हरसे, बाग सघन वन बन जायें,
इतना बरसो कूप ताल सर छलकाओ।7।
9 जून 2026
सर्वधर्म समभाव बना कर रहना चाहिए
गीतिका
24 मई 2026
मार्ग मध्यम ही करें सारे ग्रहण माँ शारदे
आज ‘आकुल’ भी घिरा है बीच ऊहापोह
में,
22 मई 2026
जिस पर बीती मित्र, आफतें वह ही जाने
अपदांत
समांत- आने
जिस पर बीती मित्र, आफतें वह ही जाने। होनी टले न घात, कह गए सभी सयाने। बिल्ली काटे मार्ग, कहीं पर रोये कुत्ता, छींकें जाते वक्त, अपशगुन है पहचाने। बोले काक मुँडेर, अतिथि या खबर मिले शुभ, दिखे सगर्भा नार, अशुभ हैं घर से जाने। लप लप करती जीभ, साँप की भाँति किसी की, है ना करने योग्य, भरोसा, मित्र बनाने। 'आकुल' का है मात्र, यही कहना सब समझो, प्रकृति दत्त ये सीख, यूँ ही' दुनिया ना माने।
17 मई 2026
ये रात भी हसीं है चंदा भी’ मुस्कुराए
कैसा जुनून है यह, मन जो रहे न काबू,
10 मई 2026
माँँ तो केवल माँँ होती
1 मई 2026
कभी जब मेघ बेमौसम बरस पानी बहाते हैं
मापनी- 1222 12222 12222 1222
हवाएँ भी वजह बनतीं, न होती कम तपिश जब भी,
कभी इनकी बदौलत मेघ वापिस लौट जाते हैं।2।
न विक्षोभों न लू के ही थपेड़ों से मिली राहत,
कहीं तूफान बन जाते, कहीं दहशत बढ़ाते हैं।3।
हवा सूरज जमाने से अदावत पालते आए,
मगर ये मेघ ही हैं जो सदा आशा जगाते हैं।4।
चलो वृक्षों से करते हैं सभी अब मित्रता ‘आकुल’,
यही हैं जो हवा, सूरज व मेघों को झुकाते हैं।।5।।
27 अप्रैल 2026
कहता रहा मन बाँध ले, गठरी चलें अब गाँव
26 अप्रैल 2026
चले बिन मंजिलें मिलती, नहीं बातें बनाने से
न
बागों ने कभी की है शिकायत ही जमाने से।
सदा
महके प्रकृति से पा हवा पानी व दाने से।
बुलाया
कब शजर ने आदमी को छाँव में अपनी,
न
तरुवर ने कभी रोका किसी को पास आने से।
नहीं
इनसान दे पानी हवा या खाद बागों को,
उन्हें
पावस पिलाते हैं अमिय खुल के खजाने से।
अगर
करता रहे रक्षा सदा पेड़ों व बागों की,
सदा
राहत मिलेगी आपदाओं में बचाने से।
नहीं
रहना है निर्भर आज हैं हालात बारूदी,
वही
इनसान है सम्हले तुरत आगाह पाने से।।
कभी
बैठे रहे भूलो इसे, पर अब उठो जागो,
चले
बिन मंजिलें मिलती, नहीं बातें बनाने से।।
न
हो कल भी हमारा जंग के हालात के जैसा,
यही
वो आग है ‘आकुल’ भड़कती है बुझाने से।।
24 अप्रैल 2026
हर मौसम के अपने गुण है
22 अप्रैल 2026
पेड़ बचाएँ नही छोड़ना, उनको अपने हाल पर
गीतिका
छंद-
मरहट्ठा माधवी
विधान-
29 मात्रीय छंद जिसमें 16, 13 पर यति अंत 212 (रगण) अनिवार्य।
अपदांत
समांत-
अर
लेते
हैं साँसें ये भी अरु,
देते हैं नि:श्वास भर।
पेड़
बचाएँ नही छोड़ना,
उनको अपने हाल पर।
हरियाली
या हरित चित्र जैसा भी तुम बस ढाल लो,
वृक्ष
झूमते हैं हर झौंके पर हो तो यह ध्यान धर।
करें
समर्पित तन मन रोम-रोम अपना ये धरती को,
नंदनकानन
यही बनाते हैं निसर्ग,
संथाल, घर।
विकसित
मरुउद्यान करें ये,
ही यदि हम सब सोच लें।
हर
प्राणी पाले इनको हम,
जैसे पालें जानवर।
‘आकुल’ की है सोच यही बस पेड़ों का संरक्षण हो,
श्रीगणेश
कर भृगु, दुर्वासा, ऋषियों का आह्वान कर।।
-
आकुल
भृगु ऋषि- ये नदियों और वनस्पतियों के रक्षक माने जाते हैं
ऋषि दुर्वासा- ने कल्पवृक्ष की रक्षा के लिए उसके नीचे बैठ कर तपस्या की थी।
20 अप्रैल 2026
जिद्दी नहीं पिघलते उनका नसीबा
17 अप्रैल 2026
हेे वागीशा, हंस वाहिनी, वीणापाणि, माँँ सरस्वती
हे वागीशा हंसवाहिनी,वीणापाणि माँ सरस्वती।
13 अप्रैल 2026
जैसी करनी वैसी भरनी है
11 अप्रैल 2026
घर में रहती शांति, मिल जुल कर हम यदि रहें
यह विभीषिका युद्ध की देती है संदेश
मुक्तकंठा छंद
(ईरान-इजरायल-अमेरिका युद्ध पर)
