27 अप्रैल 2026

कहता रहा मन बाँध ले, गठरी चलें अब गाँव

 गीतिका 
छंद- मणिमाल
मापनी- 11212 11212 11212 1121
अपदांत
समांत- आँँव

कहता रहा मन बाँध ले, गठरी चलें अब गाँव।
शहरी नहीं अपने सगे, सब व्यर्थ के हर दाँव।

हर बात पे अहसान की, छवि झूठ के दस बोल,
बिन पेड़ के पथ दूर तक, मिलती नहीं कुछ छाँव।

कम बोलतीं पिक और हैं, कम हो रहे खग शोर,
हर ओर कूकर साँड के, जमने लगे अब पाँव।

इतना लगा बिन वृक्ष ही, सब आज के परिणाम,
कल धूप भीषण हो मिले, चल छोड़ के अब ठाँव।

मत छोड़ के घर बार जा, यह ही है ‘आकुल’ स्वर्ग
समझे न क्यों तब काक था, कहता रहा कर काँव।

26 अप्रैल 2026

चले बिन मंजिलें मिलती, नहीं बातें बनाने से

 गीतिका
छंद- विधाता
मापनी- 1222 1222 1222 1222
पदांत- से
समांत- आने

न बागों ने कभी की है शिकायत ही जमाने से।

सदा महके प्रकृति से पा हवा पानी व दाने से।

 

बुलाया कब शजर ने आदमी को छाँव में अपनी,

न तरुवर ने कभी रोका किसी को पास आने से।

 

नहीं इनसान दे पानी हवा या खाद बागों को,

उन्‍हें पावस पिलाते हैं अमिय खुल के खजाने से।

 

अगर करता रहे रक्षा सदा पेड़ों व बागों की,

सदा राहत मिलेगी आपदाओं में बचाने से।


नहीं रहना है निर्भर आज हैं हालात बारूदी,

वही इनसान है सम्‍हले तुरत आगाह पाने से।।

 

कभी बैठे रहे भूलो इसे, पर अब उठो जागो,

चले बिन मंजिलें मिलती, नहीं बातें बनाने से।।

 

न हो कल भी हमारा जंग के हालात के जैसा,

यही वो आग है ‘आकुल’ भड़कती है बुझाने से।।

24 अप्रैल 2026

हर मौसम के अपने गुण है

 गीतिका
प्रदत्त छंद- लावणी/ ताटंक
विधान- 30 मात्राा, 16, 14 अंत तीन गुरु।
प्रदत्त पदांत- है
प्रदत्त समांत- आता

हर मौसम के अपने गुण है सबको तभी लुभाता है।
मिल जाये मनभाया उसका जैसे दिल खिल जाता है।

गरमी सरदी वर्षा पतझड़ मधुऋतु भी दी मानव को,
इसमें आते ढेरों पर्वोत्सव सब सहज मनाता है।

सुख-दुख, धूप-छाँव के जैसे आते हैं चल देते हैं,
प्रकृति सदा संकट को टाले मनव से जो नाता है।

इसी तरह चलता है जीवन धरती पर हर प्राणी का,
सक्षम बनना है हरसूरत मौसम हमें सिखाता है।

जीव दया सर्वोपरि सेवा बन निर्बल का संबल तू,
दिये प्रकृति ने खोल हाथ बन सक्षम तू तो दाता है।।

22 अप्रैल 2026

पेड़ बचाएँ नही छोड़ना, उनको अपने हाल पर

गीतिका

छंद- मरहट्ठा माधवी

विधान- 29 मात्रीय छंद जिसमें 16, 13 पर यति अंत 212 (रगण) अनिवार्य।

अपदांत

समांत- अर

लेते हैं साँसें ये भी अरु, देते हैं नि:श्वास भर।

पेड़ बचाएँ नही छोड़ना, उनको अपने हाल पर।


हरियाली या हरित चित्र जैसा भी तुम बस ढाल लो,

वृक्ष झूमते हैं हर झौंके पर हो तो यह ध्यान धर।


करें समर्पित तन मन रोम-रोम अपना ये धरती को,

नंदनकानन यही बनाते हैं निसर्ग, संथाल, घर।


विकसित मरुउद्यान करें ये, ही यदि हम सब सोच लें।

हर प्राणी पाले इनको हम, जैसे पालें जानवर।


आकुलकी है सोच यही बस पेड़ों का संरक्षण हो,

श्रीगणेश कर भृगु, दुर्वासा, ऋषियों का आह्वान कर।।

- आकुल


भृगु ऋषि- ये नदियों और वनस्पतियों के रक्षक माने जाते हैं

ऋषि दुर्वासा- ने कल्पवृक्ष की रक्षा के लिए उसके नीचे बैठ कर तपस्या की थी।

21 अप्रैल 2026

दुख-सुख आशा और निराशा

 #छंद_पद

विधान- चौपाई + सार छंद से पूर्ति एवं शेष द्विपदियाँ पृथक् तुकांत।

दुख-सुख आशा और निराशा ।
जीवन-मृत्यु, परिस्थितियों ने, थोड़ा किया तमाशा ।।
सुख-दुख की परिभाषाओं का अलग-अलग पैमाना ।
सच्चा-झूठा देखा वह था, जग का ताना-बाना ।।
अपना कौन पराया सारे दुविधाओं में अटके।
कौन यहाँ संतुष्ट सभी तो सुविधाओं में भटके ।।
लेना-देना दाँव यही इक, चलता-फिरता पाया ।
कुछ ने अपना #भाग लिया पर कुछ ने है हथियाया ।।
कर्मों का फल यहीं मिलेगा, कुछ खो कर कुछ पा कर ।
‘आकुल’ ढाई आखर ही तू, रखना सदा जमा कर ।।

20 अप्रैल 2026

जिद्दी नहीं पिघलते उनका नसीबा

 गीतिका
छंद- वसंत तिलका  (वार्णिक)
मापनी 221 211 121 121 22
पदांत- उनका नसीबा
समांत- अलते

जिद्दी नहीं पिघलते उनका नसीबा।
आँखें सदा बदलते उनका नसीबा।

होते कई गुनहगार न मार से भी,
बोलें न ही बहलते उनका नसीबा।

खर्चे करें अधिक है कम आय तो भी,
ले ले उधार पलते उनका नसीबा।

बैठे रहें पर नहीं रुकती जुबाँ है ,
बोले बिना न चलते उनका नसीबा।

ना हो सही समय ‘आकुल’ छूट जाते,
मौके कभी फिसलते उनका नसीबा।     

18 अप्रैल 2026

जी तू किसी भी तरह ज़ि‍न्‍दगी

गीतिका
छंद- विध्‍वंकमालिका (मापनी युक्‍त मात्रिक छंद)
मापनी- 221 221 221 2
पदांत- ज़ि‍न्‍दगी
समांत- अह

जी तू किसी भी तरह ज़ि‍न्‍दगी ।
हो ना ख़तम बेवजह ज़ि‍न्‍दगी ।

रख आस चल तू अकेले यहाँ ,
होगी कभी तो फ़तह ज़ि‍न्‍दगी ।

हो या न हो कारवाँ, दोस्‍त हों,
हो ख़ुशनुमा हर सुबह ज़ि‍न्‍दगी ।

रिश्‍ते निभें ठीक, ना भी निभें,
जी ले तनिक कर सुलह ज़ि‍न्‍दगी ।

ना कर्ज़, ना मर्ज़, ना शत्रुता’,
’आकुल’ नरक है कुनह ज़ि‍न्‍दगी ।

कुनह- द्वेष, शत्रुता

17 अप्रैल 2026

हेे वागीशा, हंस वाहिनी, वीणापाणि, माँँ सरस्‍वती

गीतिका 
छंद- लावणी
पदांत- 0
समांत- अती

हे वागीशा हंसवाहिनी,वीणापाणि माँ सरस्‍वती।
श्‍वेत पुष्‍प चरणों में अर्पित, माँ स्‍वीकारों है विनती।

माते है साष्‍टांग दंडवत, निर्मल मन मेरा कर दो,
बुद्धि प्रखर हो ऐसा वर दो, कभी न मुझसे हो गलती।

गति जीवन की हो निर्बाधित, चलती रहे लेखनी बस,
समय कठिन हो कण्‍टकीर्ण पथ, साँसें तुझे रहें भजती।

ना दुर्वचन कहे जिह्वा ना आए ही दुर्भाव कभी,
जीवन हो निष्‍काम कर्म को सदा समर्पित हो हसती।

सबको ही सद्बुद्धि मिले माँ, हे पद्मजा प्रगति श्रेया,
आकुल का मन हो जाए माँ गंगा-यमुना-सरस्‍वती।

16 अप्रैल 2026

दाे कुंडलिया छंद

बातें जो करते बहुत, करते कम जो काम।
संकट में पड़ते वही, होते हैं नाकाम
होते हैं नाकाम, सदा मिलती न फिरौती।
नफा और नुकसान, प्रकृति सौदे की होती।
खिलता उनका भाग्‍य, मिलें ढेरों सौगातें।
जो करते हैं कर्म, व्‍यर्थ ना करते बातें।।

2
जग की अंधी दौड़ में, छूटें घर परिवार।
संबंधों व्‍यवहार में, पड़ने लगें दरार
पड़ने लगें दरार, हुआ तकनीकी मानव।
उसे नहीं स्‍वीकार, हार या कहीं पराभव।
’आकुल’ का यह छंद, कहानी दुखती रग की।
कई न पाते लौट, दौड़ में अंधी जग की।।

14 अप्रैल 2026

लता मंगेशकर संगीत का प्रथम स्‍वर ‘सा’ (षडज) थीं तो आशा भौंसले पाँचवाँ स्‍वर ‘पा’ (पंचम) थीं

    संगीत की अद्वितीय गीत साम्राज्ञी के रूप में भारत की दो गायिकों के बिना जैसे बॉलिवुड का संगीत सूना हो गया। दोनों ही अपने जीवन की पूरक थीं। जिन गीतों को लता जी ने नहीं गाया उसे गा कर आशा जी ने उसे अमर कर दिया। दोनों में जितना प्रेम था उतनी प्रतिस्पर्द्धा भी थी। लता के स्‍वर में मिठास का अनुपम स्‍वरूप था तो आशा जी के स्‍वरों में अनहद नाद था। पंचम दा (संगीतकार आर. डी. बर्मन) से मिल कर आशा ने पंचम स्‍वर को सिद्ध कर दिया। दोनों ने मिल कर कभी न भुलाये जाने वाले गीतों को रचा। लता ने अपने पहले प्रेम को संगीत को सम‍िर्पित कर दिया आजन्‍म विवाह नहीं किया, वहीं आशा जी ने अपने पहले प्रेम को सदा के लिए ‘भौंसले’ के रूप में अमर कर दिया। तल्खियाँ तब से ही शुरु हुईं, किंतु पारिवारिक अनबन को अपने प्रोफेशनल जीवन में उन्‍होंने कभी भी उभरने नहीं दिया। दोनों बॉलिवुड की दो स्‍तम्‍भ थीं। दूसरी गायिकों के लिए वें हमेशा प्रतिस्‍पर्द्धी रहीं किंतु मीडिया ने अनेक प्रकार से तोड़ मरोड़ कर प्रस्‍तुत करता रहा। प्रतिभा कभी छिपती नहीं। लता और आशा जी ने कभी भी अफवाहों को तूल नहीं दिया। लता जी जहाँ कई गानों को गाने के लिए मना कर देेेती थीं, वहीं आशा जी ने शायद ही किसी गाने के लिए मना किया हो, यही कारण था कि आशा जी कभी-कभी लगता था कि लता जी से श्रेष्‍ठ रहीं। लता जी ने संगीतकार ओ पी नैयर के निर्देशन में कभी नहीं गाया जबकि आशा जी ने ओ.पी. नैयर के सर्वाधिक गाने गाये।                        

    लता जी के स्‍वर में अमरत्‍व था, वहीं आशा जी के स्‍वरों में सिद्धि का प्रकाश था। संगीत के सात सुरों में सा और पा अचल स्‍वर माने जाते हैं। शेष सुरों के कोमल व तीव्र स्‍वर होते हैं। बॉलिवुड में 
लता मंगेशकर संगीत का प्रथम स्‍वर ‘सा’ (षडज) थीं तो आशा भौंसले पाँचवाँ स्‍वर ‘पा’ (पंचम) थीं। दोनों ही संगीत के अचल स्‍वर थीं। बॉलिवुड अनेक दिग्‍गज संगीतकारों द्वारा रची रचनाओं का एक अनोखा संगम तीर्थ है और इस संगम में गंगा और यमुना की तरह इन दोनों के योगदान को कभी भी नहीं भुलाया जा सकेगा। शेष गायिकायें समय की धार में सरस्‍वती नदी की तरह उनमें समाती चलीं गईं।  
    स्‍वर कोकिला लता जी भारत रत्‍न थीं तो स्‍वर किन्‍नरी आशा भौंसलें सर्वोच्‍च पद्म पुरस्‍कार 'पद्म विभूषण' से सम्मानित थीं। ये दोनों पुरस्‍कार ही असाधारण और विशिष्‍ट सेेेवा के लिए दिया जाता है।अपने पिता के निधन के बाद दोनों ने परिवार की जिम्‍मेदारी सँभाली और दोनों ही बॉलिवुड की सितारा बनीं। अंत भी कितनी समानतायें लिए हुआ। ब्रीच केंडी में अंतिम सांस, सभी आर्गन फेल्‍योर के कारण मृत्‍यु और दोनों ही 92 वर्ष की उम्र में अनंत में विलीन हुईं। 

    आशा जी के गाये हजारों गीतों में सैंकड़ों गीत हैं, जो मुझे पसंद हैं, उनके गाये इन सोलो और ड्यूएट गीतों ने मेरे जीवन के संगीत में बहुत गहरा असर डाला है जिनसे, आशा जी को मेरे पसंदीदा उनके गीतों से उन्‍हें श्रद्धांजलि देता हूँ- तोरा मन दरपन कहलाए... फिल्‍म- काजल; निगाहें मिलाने को जी चाहता है.... फिल्‍म- दिल ही तो है; आइये मेहरबाँ..... फिल्‍म- हावड़ा ब्रिज; ओ मेरी जां मैंने कहा...., रेशमी उजाला है..... फिल्‍म- दि ट्रेन;  कतरा कतरा .... फिल्‍म- इजाजत  मेरा कुछ सामान.....फिल्‍म इजाजत झुमका गिरा रे.....फिल्‍म– मेरा सायाचुरा लिया है तुमने.....फिल्‍म- यादों की बारात;  पिया तू अब तो....... फिल्‍म- कारवाँ; दुनिया में लोगों को..... फिल्‍म- अपना देशआजा आजा मैं हूँ प्‍यार तेरा....फिल्‍म- तीसरी मंजिलदिल जलों का दिल जला के....; ये मेरा दिल प्‍यार का दीवाना..... फिल्‍म- डॉन; दिल चीज क्‍या है...फिल्‍म- उमरावजान; पान खाए सैंया हमारो....फिल्‍म- तीसरी कसम; जिंदगी इत्‍तेफाक है..... फिल्‍म आदमी और इंसान; मुझे नौ लखा मंगा दे......फिल्‍म- शराबी; रोज़ रोज़ आंखों तले.....फिल्‍म- जीवा;  दो लफ़्जों की है दिल की कहानी.... फिल्‍म- द ग्रेट गेम्‍बलर; खतूबा.... फिल्‍म-  अलीबाबा और 40 चोर; हुस्‍न के लाखों रंग.... फिल्‍म जॉनी मेरा नाम; कोई आया आने भी दे.... फिल्‍म- काला सोना; करले प्‍यार करने के दिन हैं यही..... फिल्‍म- तलाश दम मारो दम......फिल्‍म- हरे राम हरे कृष्‍ण; जरा सा झूम लूँ मैं.... फिल्‍म- दिल वाले दुल्‍हनियां ले जायेंगे; किताबें बहुत सी पढ़ी होंगी तुमने..... फिल्‍म बाज़ीगर; मुझको हुई न खबर..... फिल्‍म- कुछ कुछ होता है; याई रे याई रे.... फिल्‍म- रंगीला; मेरा नाम शबनम...फिल्‍म- कटी पतंग; मौसम मस्‍ताना....... फिल्‍म- सत्‍ते पे सत्‍ता; आज की रात कोई आने को है रे बाबा....फिल्‍म- अनामिका; तू रूठा तो मैं..... फिल्‍म- जवानी;  प्‍यार करने वाले..... फिल्‍म– शान; तू तू है वही.... फिल्‍म- ये वादा रहा;  ओ मेरी जान....... फिल्‍म- सनम तेरी कसम; जाने जाँँ ढूँढता फिर रहा.... फिल्‍म- जवानी-दीवानी; जाइए आप कहाँँ जाएँगे...., ये है रेशमी जुल्‍फों का उजाला..... फिल्‍म- मेरे सनम; आओ हुजूर तुमको सितारों में ले चलूँ.... फिल्‍म- किस्‍मत; हुजूरे वाला जो हो इजाजत.... फिल्‍म- ये रात फिर न आएगी; आगे भी जाने न तू.... फिल्‍म- वक्‍त; परदे में रहने दो.... फिल्‍म- शिकार; रात अकेली है... फिल्‍म- ज्‍वैल थीफ।      

13 अप्रैल 2026

जैसी करनी वैसी भरनी है

गीतिका 
मापनी- 222 222 222 // 22 22 22 22 2   

जैसी करनी वैसी भरनी है।
काल परिस्थितियों से बननी है।

मौसम के प्रतिकूल चले जो भी,
तबियत अकसर तभी बिगड़नी है।

कम खा गम खा हद में रहना ही,
वर्ना तो बस चिंता बढ़नी हैं।

बस में है अपने केवल करना,
बाकी तो ईश्‍वर की चलनी है।

क्‍यों ना ऐसे जीवन जियें सभी,
नहीं प्रकृति से कोई ठननी है।। 

11 अप्रैल 2026

घर में रहती शांति, मिल जुल कर हम यदि रहें

छंद- सोरठा 
विधान- दोहे का हूबहू विपरीत यानि 11, 13 पर यति। 
अपदांत 
समांत- ऊकारांत इए 

गीतिका
फूले मगर न श्‍वास, धीरे धीरे घूमिए।
मन का बनें न दास, करना योग न भूलिए।

घर में रहती शांति, मिल जुल कर हम यदि रहें,
रहती कभी न भ्रांति, नहीं बड़ों से रूठिए। 

बच्‍चे वृद्ध जवान, घूमें नित्‍य शाम सुबह,    
घूमें उस दौरान,  कई समस्‍या बूझिए।।

आता सबका दौर, कभी न हारें उम्र से,
करना यह भी गौर, खुशियों को बस ढूँढिए।

जीएँ रख विश्‍वास, मरना शाश्‍वत सत्‍य है,
कर जायें कुछ खास, फिर जीवन से छूटिए।।

सबका रखना मान, सुख-दुख तो मेहमान हैं,
जिएँ सदा यह जान, समदर्शी बन पूजिए ।।

छल प्रपंच से दूर, ‘आकुल’ की यह सीख रह,
क्‍यों कर तनिक सबूर, खुद से थोड़ा पूछिए ।। 

यह विभीषिका युद्ध की देती है संदेश

 मुक्‍तकंठा छंद

(ईरान-इजरायल-अमेरिका युद्ध पर)

1
यह विभीषिका युद्ध की, देती है संदेश।
प्रकृति करेगी संतुलन, छोड़ा मार्ग न लेश ।।
बाढ़, आपदा, रोग, क्षति, आवासन सब ध्‍वस्‍त,
ले डूबेगी सम्‍पदा जिसके लिए ये’ क्‍लेश ।।
जिसके लिए ये’ क्लेश, रह रहा किस भ्रम में वह ।
छीन शांति अरु चैन, न ‘आकुल’ मिलनी है यह ।।

2
वैसे भी जीवन रुका, रुके सभी अभियान ।
सभी योजनाएँ रुकीं, नष्‍ट सभी अनुमान ।।
यह विभीषिका युद्ध की, हुई भयावह रोज़,
पहुँचें अपने घर सभी, यह ही बस है ध्‍यान ।।
यह ही बस है ध्‍यान, बचे जीवन कैसे भी ।
कर लेंगे संघर्ष, बचा है क्‍या वैसे भी ।।  


दुख रहता है सदा न भाई

छंद- रासा
विधान- 16 मात्रीय छंद। जिसमें तीन चौकल अंत 2 गुरु वाचिक अनिवार्य। यति अंत में। लय चौपाई की तरह।
अपदांत
समांत- आई 

दुख रहता है सदा न भाई।  
सुख से हुई सदा भरपाई।

सुख जब जब डूबा जीवन में,  
दुख ने आग सदा भड़काई।

दुख ने चाहा सदा भरोसा,
जब तक सुख की घड़ी न आई।

आते ही सुख दुख को भूले,
यह सुख की है बड़ी बुराई।

क्‍यों सीखे ना आकुल सुख से,
दुख ज्‍यादा सुख कम सच्‍चाई  ।। 

न मन के मुताबिक चली जिंदगी है

 छंद- भुजंग प्रयात

मापनी- 122 122 122 122

समांत- अरना

अपदांत

 

कही बात पर तुम सदा ही ठहरना ।

लिया हाथ में तो नहीं फिर मुकरना ।।

 

नहीं काम होते कई बिन हुनर के,

अगर कर सको तुम तभी हाथ धरना ।

 

न पाना उसे जो न हक़ में तुम्‍हारे,

न कोशिश ही’ करना न हद से गुजरना ।

 

न मन के मुताबिक चली जिंदगी है,

तुम्‍हें ही मुताबिक उसी के सुधरना ।


न काबिल सदा ए‍क दिन हों मुकाबिल,

इसी हौसले से सदा तुम निखरना ।।  

7 अप्रैल 2026

दो पद

पद-1            

विधान- छंद शृंगार + पूरक पंक्ति सरसी एवं द्विपद सरसी (पृथक् तुकांत)

विधान- शृंगार- 16 मात्रा। आदि त्रिकल-द्विकल, अंत द्विकल-त्रिकल, अंत गुरु लघु

विधान- सरसी- मात्रा भार- 27; 16 (चौपाई)+11(दोहे का सम चरण) पर यति।

बने अब ऐसा इक संसार।

जीवन में सब सभ्‍य शिष्ट हों रख आचार विचार ।। 

सौर, पवन ऊर्जा जल-स्रोतों, खेती पर हो काम।  

उपनिवेशिकाएँ विकसित हों हर पथ के हों नाम ।।

वन उपवन सुरभित संरक्षित हों अब हर संथाल।

दिव्‍यांगों असहायों की हो समुचित सार सँभाल ।।

शिक्षा संस्‍कृति, धर्म, पर्व पर दिखे सदा सद्भाव ।

‘आकुल’ जीवन का उद्देश्‍य हो, सर्वधर्म समभाव ।।


पद-2

विधान- छंद चौपई + पूरक पंक्ति सरसी एवं द्विपद सरसी (सम तुकांत)

विधान- चौपई- 15 मात्रा। आदि गुरु , अंत गुरु लघु से। चौपाई के अंत मे गुरु को लघु कर देने से यह छंद सिद्ध होता है, इसलिए लय चौपाई की।  

विधान- सरसी- मात्रा भार- 27; 16 (चौपाई)+11(दोहे का सम चरण) पर यति।

हो प्रभु ऐसा इक संसार।

इक सपना वसुधैवकुटुँबकम का हो अब साकार।। 

बँधें न बाँध जहाँ नदियों के, तट हों तीरथ द्वार।

मिलें न नदियाँ कलिमल लेकर, मिटे सिंधु का खार ।।

खेल, योग व्‍यायाम, प्रशिक्षण, के हों ज्ञान विहार ।

हो अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता व आपस में सहकार।।

‘आकुल’ सर्वे भवन्‍तु सुखिन:, हो संकल्‍प विचार ।

सर्वधर्म समभाव दिखे हर तीज और त्‍योहार।।