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16 अप्रैल 2026

दाे कुंडलिया छंद

बातें जो करते बहुत, करते कम जो काम।
संकट में पड़ते वही, होते हैं नाकाम
होते हैं नाकाम, सदा मिलती न फिरौती।
नफा और नुकसान, प्रकृति सौदे की होती।
खिलता उनका भाग्‍य, मिलें ढेरों सौगातें।
जो करते हैं कर्म, व्‍यर्थ ना करते बातें।।

2
जग की अंधी दौड़ में, छूटें घर परिवार।
संबंधों व्‍यवहार में, पड़ने लगें दरार
पड़ने लगें दरार, हुआ तकनीकी मानव।
उसे नहीं स्‍वीकार, हार या कहीं पराभव।
’आकुल’ का यह छंद, कहानी दुखती रग की।
कई न पाते लौट, दौड़ में अंधी जग की।।

2 फ़रवरी 2026

जीभ - तीन भाव

https://www.anubhuti-hindi.org/sankalan/kundaliya_diwas/gopalkrishnabhatt_akul.htm 

       जीभ- तीन भाव

 


कर दे सबको आलसी, जमे रहें बत्तीस
दाँत काटकर जीभ को, झाड़ें अपनी खीस
झाड़ें अपनी खीस, जीभ में धीरज इतना
यह भी जानें दाँत, प्रेम वह करती कितना
चखती पहले स्वाद, बाद दाँतों को भर दे
निगले फिर वह साफ, सभी दाँतों को कर दे


कटती दाँतों से रही, जिह्वा कितनी बार
लड़ते फिर भी संग में, करते सब व्यवहार
करते सब व्यवहार, स्वाद भी सँग-सँग चखते
मगरमच्छ से बैर, नहीं पानी में रखते
एक अकेली कीर्ति, जीभ की कभी न घटती
दाँतों की बत्तीस, सोचते रात न कटती


दाँतों की इस भीड़ में, जीभ अकेली एक
शत्रु भले बत्तीस हों, नीयत रखनी नेक
नीयत रखनी नेक, एक दिन उन्हें बिछड़ना
टूटेंगे सब दाँत, अंत तक उन्हें पकड़ना
बनते हरदम ढाल, धनी वह भी बातों की
इसीलिये तो ध्यान, रखे वह भी दाँतों की

- डॉ. गोपाल कृष्ण भट्ट ‘आकुल’
१ फरवरी २०२६

20 दिसंबर 2025

दाँँतो को रखिए सदा, स्‍वच्‍छ दुर्गंधहीन (कुंडलिया छंद )

 1
दाँतों को रखिए सदा, स्‍वच्‍छ दु्र्गंधहीन।
खाएँ कटु, मिष्‍ठान्‍न कम,  कहें शास्‍त्र प्राचीन
कहें शास्‍त्र प्राचीन, अगर दातुन कर पाएँ। 
विषहर नीम बबूल, मसूढ़े स्‍वस्‍थ बनाएँ ।।
होना है नीरोग, रखें निर्मल आँतों को ।
और दुर्गंधहीन, रखें सदैव दाँतों को ।।
2
ओने-कोने में फिरे, करे लार से नर्म।
लिपट-लिपट कर प्रेम से, करती अपना कर्म
करती अपना कर्म, भले ही निर्ममता से ।
दाँत रहें हर स्‍वच्‍छ, जीभ की कर्मठता से।
रहना उनके साथ, जिंदगी भर हैं ढोने।
करते ज्‍यों नित साफ, घरों के ओने-कोने ।।
3
कहते हैं बत्‍तीस हों जिसके मुँह में दाँँत। 
फलता है वह जो कहे, पंडित जी की भाँँत।।
पंडित जी की भाँँत, जीभी जो चले सर्वदा। 
दाँँत काटती जीभ, फँसे दाँँतों में करदा।। 
भोजन भी बेस्‍वाद, ग्रस्‍त रोगों से रहते।
मोती जैसे दाँँत झड़ें जल्‍दी हैं कहते।।    

7 जनवरी 2023

दाँतों की इस भीड़ में.... (कुंडलिया छंद)

 1

कटती दाँतों से रही, जिह्वा कितनी बार ।

लड़ते फिर भी संग में, करते सब व्‍यवहार ।

करते सब व्यवहार, स्‍वाद भी सँग-सँग चखते ।

मगरमच्‍छ से बैर, नहीं पानी में रखते । 

एक अकेली कीर्ति, जीभ की कभी न घटती ।

दाँतों की बत्‍तीस, सोचते रात न कटती ।।  

कर दे सबको आलसी, जमे रहें बत्‍तीस ।

दाँत काटकर जीभ को, झाड़ें अपनी खीस

झाड़ें अपनी खीस, जीभ में धीरज इतना ।

यह भी जानें दाँत, प्रेम वह करती कितना ।

चखती पहले स्‍वाद, बाद दातों को भर दे ।

निगले फिर वह साफ, सभी दाँतों को कर दे ।।

3

दाँतों की इस भीड़ में, जीभ अकेली एक ।

शत्रु भले बत्‍तीस हों, नीयत रखनी नेक

नीयत रखनी नेक, एक दिन उन्हें बिछड़ना ।

टूटेंगे सब दाँत, अंत तक उन्‍हें न छड़ना ।

बनते हरदम ढाल, धनी वह भी बातों की ।

इसीलएि तो ध्‍यान, रखे वह भी दाँतों की ।।