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1 फ़रवरी 2024

इसका प्रभाव तय (गीतिका)

छन्‍द- सारिका (वार्णिक) घनाक्षरी की भाँति
विधान- प्रति चरण 26 वर्ण 6,6,6,8 पर यति अनिवार्य । अंतिम आठ वर्ण लघु। प्रथम दो षट्कल तुकांत। 
पदांत- पर तय
समांत- अन

बिना वजन क्‍यूँ, बोल वचन तू, इसका प्रभाव, बहु जन पर तय।
कर्ज नासूर है, ऐसा फितूर है, इसका प्रभाव, घर धन पर तय।

एकाकीपन भी, है एक त्रासदी, असमंजसता, पल पल क्षण क्षण ,
सुरसा की भाँति, बढ़ती है भ्रांति, इसका प्रभाव, तन मन पर तय।

पराश्रयी होना, ज्‍यों बोझा बनना, जीवन में कर, तय पर कर कुछ,
बूँद बूँद झट, घटता है घट, इसका प्रभाव, धड़कन पर तय।

स्‍वाभिमान रख, वक्‍त को परख, कूट है जीवन, सुपथ हर कुटिल,
न ठौर ठिकाना,  कुलक न दाना,  इसका प्रभाव, बचपन पर तय।

वृक्षारोपण हो, ना आरोपण हो,  प्रकृति बचा तू, दल बल कल सँग,   
दे न हमें बस, रौद्र रूप दस, इसका प्रभाव, कन कन पर तय।      
--00--
1. कुलक- मुखिया, 
2. प्रकृति के दस रौद्र रूप-  दावानल, बड्वानल, बाढ़, भूकम्‍प, अतिवृष्टि, सूखा, महामारी, अकाल मृत्‍यु और कुपोषण    

 

31 जनवरी 2024

नारी पर सदा ही गर्व हो

गीतिका

छन्‍द- शृंगार 
विधान- प्रति चरण मात्रा 16, आरंभ गुरु से व  अंत लघु गुरु/ रगण (212)
पदांत- हो
समांत- अर्व

मुक्‍तक-लोक चित्र मंथन 504
लोकोत्सव त्योहार सर्व हो।
नारी बिन असम्भव पर्व हो।1

जीवित संस्कार सब आज हैं,

नारी से ही सदा अथर्व हो।2

हर रिश्तों में आज भी मिले,

चाहे गैर, निज, गंधर्व हो।3

कदापि नहीं मानी हार है,

पिलती रही प्रकाश-शर्व हो।4

आई युगों से है झेलती,

कष्ट, हर्ष, मर्द या दर्व हो।5

अब तो 'आकुलइसे त्राण दें ,

नारी पर बस सदा गर्व हो।6

1. अथर्व- श्रीगणेश 2. शर्व- अंधकार 3. दर्व- राक्षस, आततायी।

30 मार्च 2023

पहले यह समझ

गीतिका

छंद- गीतिका
मापनी- 2122 2122 2122 212 
पदांत- यह समझ
समांत- अहले

साँँस चलती है समय से तेज पहले यह समझ।
चल सके तो वक्‍त के ही संग बहले यह समझ।

पंचतत्‍वों से बना अनमोल है यह तन मिला,
यह बचें इनके लिए हर कष्‍ट सह ले यह समझ।

यह अगर है संतुलित तो मान ले तू है सुखी,
शेष सुख तो हैं क्षणिक की मौज कहले यह समझ।

सूर्य चन्‍दा हैं अडिग चंचल युगों से है धरा
हैं तभी हलचल कदाचित् रोज दहले यह समझ।

इसलिए 'आकुल' का कहना मान धरती को सजा,
फिर हवाओं जंगलों से कर सुलह ले यह समझ।

28 मार्च 2023

मन हो जाए गंगा-यमुना-सरस्‍वती

 गीतिका

छंद- लावणी

हे वागीशा हंसवाहिनी,वीणापाणि माँ सरस्‍वती ।

श्‍वेत पुष्‍प चरणों में अर्पित, माँ स्‍वीकारों है विनती ।1।

माते है साष्‍टांग दंडवत, निर्मल मन मेरा कर दो,

बुद्धि प्रखर हो ऐसा वर दो, कभी न मुझसे हो गलती ।2।

गति जीवन की हो निर्बाधित, चलती रहे लेखनी बस,

समय कठिन हो कण्‍टकीर्ण पथ, साँसें तुझे रहें भजती ।3।

ना दुर्वचन कहे जिह्वा ना आए ही दुर्भाव कभी,

जीवन हो निष्‍काम कर्म को सदा समर्पित हो हस्‍ती ।4।

सबको ही सद्बुद्धि मिले माँ, हे पद्मजा प्रगति श्रेया,

आकुल का मन हो जाए माँ गंगा-यमुना-सरस्‍वती ।5।

27 मार्च 2023

सच बोल भी सकता नहीं

गीतिका 
छंद- मनहंस (वार्णिक)
मापनी- 112 121 121 211 212 (स ज ज भ र)
पदांत- भी सकता नहीं
समांत- ओल
 
सच जान के सच बोल भी सकता नहीं।
तब जान लो दिल खोल भी सकता नहीं।
 
कम तोल के व्‍यवसाय जीवन में किया,
हर वक्‍़त वो कम तोल भी सकता नहीं।
 
समभाव भी रखना जरूरत वक्‍़त पे,   
कटुता कहीं पर घोल भी सकता नहीं।
 
अपराध तो अपराध है इलज़़ाम को 
हर शख्‍़स के सर ढोल भी सकता नहीं।
 
नुकसान दे हर चीज को कम आंकना,
जब चीज़ बंद टटोल भी सकता नहीं। 

11 जनवरी 2023

छेड़ें न पर्वतों को पर्वत तड़क रहे हैं

मापनी- 2212 122 2212 122
पदांत- रहे हैं
समांत- अड़क

छेड़ें न पर्वतों को, पर्वत तड़क रहे हैं।
सड़कें न पुल बनाएँ, जंगल भड़क रहे हैं।1।

दर घर गँवा रहे उन, रहवासियों से’ पूछो,
आँखों में रात बीतें, हर दिन कड़क रहे हैं।2।

हर साल हों तबाही, फिर भी नहीं सँभलते,
अब पर्वतों की बारी, मौसम हड़क रहे हैं।3।

धरती न फट पड़े दे, अनहोनियों को दावत,
दिग्मूढ़ हैं नहीं क्यों, रग-रग फड़क रहे हैं।4।

सीने न पर्वतों के, चीरो बहुत हुआ अब,
छेड़ो न वादियों को, पत्ते खड़क रहे हैं।5।

अब हो निसर्ग ऐसा, सब स्वर्ग कह सकें जो,
हर मोड़ की गवाही, देते सड़क रहे हैं।6।

पीढ़ी न आज झेले, अनहोनियाँँ करो कुछ,
कब से सभी प्रदूषित,  कण कण गड़क रहे है।7।

8 जनवरी 2023

कोई बता रहा

छंद- अवतार 
मापनी- 2212 1212 2212 12
पदांत- रहा कोई बता रहा,
समांत-
इक और साल छा रहा कोई बता रहा ।
गत वर्ष मुँह छिपा रहा कोई बता रहा ।1।
कोई लुटा बजार में ना होश है उसे,
यह ही मलाल खा रहा कोई बता रहा ।2।
देखे मिजाज ठंड के नव वर्ष में कड़े,
कुछ को अभी न भा रहा कोई बता रहा ।3।
आगाज ही अलग-थलग हो क्या करे कहो,
परमाणु युद्ध आ रहा कोई बता रहा ।4।
है लाजमी गुजारना ‘आकुल’ समय अभी
फिर से सुकून जा रहा कोई बता रहा।5।

31 दिसंबर 2022

जो आगे की ओर देखते हैं

गीतिका 

छंद- सरसी/ कबीर 

पदात- देखते हैं

समांत- ओर

दे जाए कुछ संदेशा कल, भोर, देखते हैं?

लेगा करवट ऊँट कौनसी, शोर देखते हैं?

साल खड़ा अब जाने को दिन, करें विदा हँस कर,

क्‍या पाने को, नाच रहा मन, मोर देखते हैं?

 सोपानों पर चढ़े उम्र पर, धीरे-धीरे अब,

कितनी है रफ्तार समय की, जोर देखते हैं?

करें आकलन क्‍या खोया इक, अदद तसल्‍ली को,

है कितनी मजबूत साँस की, डोर देखते हैं?

मिला बहुत हों, आभारी कुछ, कर गुजरें ‘आकुल’,

बनें युगंधर, जो आगे की, ओर देखते हैं? 

-आकुल     

18 फ़रवरी 2022

काक महिमा - 2 (दोहे)

1

कोयल का घर फोड़ कर, घर घर ढूँढ़े प्रीत । 

अब तक तो कोई नहीं, मिला काक को मीत ।।

2

बड़ बड़ बातें बोल कर, काक घटाते मान ।

चाहे चतुर सुजान हैं, नहीं मिले सम्‍मान ।।

3

दशाह घाट श्‍मशान या, श्राद्ध पक्ष में श्रेय ।।

मिले काकश्री को सदा, समझो उसे न हेय ।

4

काक चेष्‍टा भले ही, जग में हुई बखान ।

भूला जग अब तक नहीं, सीता का अपमान ।।

5

गो-ब्राह्मण बिन कनागत, दशा(ह) घाट बिन काक ।

सद्गति बिन उत्‍तर करम, जीवन ना बिन नाक ।।

6

कागा महिमा जान लो, पंडित काकभुशुंड ।

पर जयंत को भी मिला, एक आँख का दंड ।।

7

कागा की परिवार से, कभी न देखी प्रीति ।

औघड़ सा घूमे सदा, कौन सिखाए रीति ।।

8

कोयल बुलबुल कब लड़ें, करें न अतिक्रम, क्‍लेश ।

कागा का भी घर बसे, हो यदि चेष्‍टा लेश ।।    

9

मादा कागा दुखी है, कागा की मति देख,

नहीं चाह कर संग में, रहे भाग्‍य के लेख ।।

10

कहीं न क्‍यों पिक जा छिपे, लेता काक निकाल।

ऐयारी में काक की, कोई नहीं मिसाल ।

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3 फ़रवरी 2022

छोटी छोटी खुशियाँ ढूँढ़ो

गीतिका

छंद - कुकुभ 

पदांत- ई

समांत- लो

छोटी-छोटी खुशियों ढूँढ़ो, जीवन मिल-जुल कर जी लो ।

जीवन घुट्टी प्रेम पियाला, जितना हो भर कर, पी लो ।

        जिनसे करते प्रेम, कमी हो, उनमें तो, कर अनदेखा,

        शायद तेरी संगत उनको, बदले यह अनुभव भी लो ।

अनुशासन भोजन में रखना, स्‍वाद जीभ तक रहता है,

व्‍यर्थ जले या फैंका जाए, घी तो तड़का भर ही लो ।

        जब तक हो गुरु ज्ञान नहीं तो, हीरा भी पत्‍थर ही है,

        शिखर मिले संगत से समझो, वो तो है पारस छी लो । 

कह कर बुरा न बनना ‘आकुल’,  मार समय की मिलती है,

भरता घाव समय ही तुम तो, केवल उधड़ा व्रण सी लो ।