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1 फ़रवरी 2024
इसका प्रभाव तय (गीतिका)
31 जनवरी 2024
नारी पर सदा ही गर्व हो
गीतिका
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| मुक्तक-लोक चित्र मंथन 504 |
जीवित संस्कार सब आज हैं,
हर रिश्तों में आज भी मिले,
कदापि नहीं मानी हार है,
आई युगों से है झेलती,
अब तो 'आकुल' इसे त्राण दें ,
1. अथर्व- श्रीगणेश 2. शर्व- अंधकार 3. दर्व- राक्षस, आततायी।
30 मार्च 2023
पहले यह समझ
गीतिका
28 मार्च 2023
मन हो जाए गंगा-यमुना-सरस्वती
गीतिका
छंद- लावणी
हे वागीशा हंसवाहिनी,वीणापाणि माँ सरस्वती ।
श्वेत पुष्प चरणों में अर्पित, माँ स्वीकारों है विनती ।1।
माते है साष्टांग
दंडवत, निर्मल मन मेरा कर दो,
बुद्धि प्रखर हो ऐसा वर दो, कभी न मुझसे हो गलती ।2।
गति जीवन की हो निर्बाधित, चलती रहे लेखनी बस,
समय कठिन हो
कण्टकीर्ण पथ, साँसें तुझे रहें भजती ।3।
ना दुर्वचन
कहे जिह्वा ना आए ही दुर्भाव कभी,
जीवन हो निष्काम
कर्म को सदा समर्पित हो हस्ती ।4।
सबको ही
सद्बुद्धि मिले माँ, हे पद्मजा प्रगति श्रेया,
आकुल का मन हो
जाए माँ गंगा-यमुना-सरस्वती ।5।
27 मार्च 2023
सच बोल भी सकता नहीं
छंद- मनहंस (वार्णिक)
मापनी- 112 121 121 211 212 (स ज ज भ र)
पदांत- भी सकता नहीं
समांत- ओल
तब जान लो दिल खोल भी सकता नहीं।
हर वक़्त वो कम तोल भी सकता नहीं।
कटुता कहीं पर घोल भी सकता नहीं।
हर शख़्स के सर ढोल भी सकता नहीं।
जब चीज़ बंद टटोल भी सकता नहीं।
11 जनवरी 2023
छेड़ें न पर्वतों को पर्वत तड़क रहे हैं
पदांत- रहे हैं
समांत- अड़क
सड़कें न पुल बनाएँ, जंगल भड़क रहे हैं।1।
आँखों में रात बीतें, हर दिन कड़क रहे हैं।2।
अब पर्वतों की बारी, मौसम हड़क रहे हैं।3।
दिग्मूढ़ हैं नहीं क्यों, रग-रग फड़क रहे हैं।4।
छेड़ो न वादियों को, पत्ते खड़क रहे हैं।5।
हर मोड़ की गवाही, देते सड़क रहे हैं।6।
कब से सभी प्रदूषित, कण कण गड़क रहे है।7।
8 जनवरी 2023
कोई बता रहा
मापनी- 2212 1212 2212 12
समांत- आ
31 दिसंबर 2022
जो आगे की ओर देखते हैं
गीतिका
छंद- सरसी/
कबीर
पदात- देखते
हैं
समांत- ओर
दे जाए कुछ संदेशा कल, भोर, देखते हैं?
लेगा करवट ऊँट
कौनसी, शोर देखते हैं?
साल खड़ा अब जाने को दिन, करें विदा हँस कर,
क्या पाने को,
नाच रहा मन, मोर देखते हैं?
सोपानों पर चढ़े उम्र पर, धीरे-धीरे अब,
कितनी है रफ्तार
समय की, जोर देखते हैं?
करें आकलन क्या खोया इक, अदद तसल्ली को,
है कितनी मजबूत
साँस की, डोर देखते हैं?
मिला बहुत हों, आभारी कुछ, कर गुजरें ‘आकुल’,
बनें युगंधर, जो आगे की, ओर देखते हैं?
-आकुल
18 फ़रवरी 2022
काक महिमा - 2 (दोहे)
कोयल का घर फोड़ कर, घर घर ढूँढ़े प्रीत ।
अब तक तो कोई नहीं, मिला काक को मीत ।।
2
बड़ बड़ बातें बोल कर, काक घटाते मान ।
चाहे चतुर सुजान हैं, नहीं मिले सम्मान ।।
3
दशाह घाट श्मशान या, श्राद्ध पक्ष में श्रेय ।।
मिले काकश्री को सदा, समझो उसे न हेय ।
4
काक चेष्टा भले ही, जग में हुई बखान ।
भूला जग अब तक नहीं, सीता का अपमान ।।
5
गो-ब्राह्मण बिन कनागत, दशा(ह) घाट बिन काक ।
सद्गति बिन उत्तर करम, जीवन ना बिन नाक ।।
6
कागा महिमा जान लो, पंडित काकभुशुंड ।
पर जयंत को भी मिला, एक आँख का दंड ।।
7
कागा की परिवार से, कभी न देखी प्रीति ।
औघड़ सा घूमे सदा, कौन सिखाए रीति ।।
8
कोयल बुलबुल कब लड़ें, करें न अतिक्रम, क्लेश ।
कागा का भी घर बसे, हो यदि चेष्टा लेश ।।
9
मादा कागा दुखी है, कागा की मति देख,
नहीं चाह कर संग में, रहे भाग्य के लेख ।।
10
कहीं न क्यों पिक जा छिपे, लेता काक निकाल।
ऐयारी में काक की, कोई नहीं मिसाल ।
--00--3 फ़रवरी 2022
छोटी छोटी खुशियाँ ढूँढ़ो
गीतिका
छंद - कुकुभ
पदांत- ई
समांत- लो
छोटी-छोटी खुशियों ढूँढ़ो, जीवन मिल-जुल कर जी लो ।
जीवन घुट्टी प्रेम पियाला, जितना हो भर कर, पी लो ।
जिनसे करते प्रेम, कमी हो, उनमें तो, कर अनदेखा,
शायद तेरी संगत उनको, बदले यह अनुभव भी लो ।
अनुशासन भोजन में रखना, स्वाद जीभ तक रहता है,
व्यर्थ जले या फैंका जाए, घी तो तड़का भर ही लो ।
जब तक हो गुरु ज्ञान नहीं तो, हीरा भी पत्थर ही है,
शिखर मिले संगत से समझो, वो तो है पारस छी लो ।
कह कर बुरा न बनना ‘आकुल’, मार समय की मिलती है,
भरता घाव समय ही तुम तो, केवल उधड़ा व्रण सी लो ।





