गीतिका
छंद- आँसू
विधान- 14 मात्रा, यति
अंत में। अंत गुरु से।
पदांत- है
समांत- ईक्षा
हर दिन एक परीक्षा है।
इसमें मिले न दीक्षा
है।
बचपन और जवानी का,
काल स्वयं परिवीक्षा
है।
मानव के हाथों में ही,
संयम और तितीक्षा है।
दुख की नही मात्र सुख
की,
रहती सदा प्रतीक्षा है।
कर्म और संस्कारों से,
होती सदा समीक्षा है।
दीक्षा- गुरु मंत्र; परिवीक्षा- प्रशिक्षण; तितीक्षा- सहनशीलता