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29 अप्रैल 2026
हैं अनगिनत रूप नृत्य के भारत देश में
27 अप्रैल 2026
कहता रहा मन बाँध ले, गठरी चलें अब गाँव
26 अप्रैल 2026
चले बिन मंजिलें मिलती, नहीं बातें बनाने से
न
बागों ने कभी की है शिकायत ही जमाने से।
सदा
महके प्रकृति से पा हवा पानी व दाने से।
बुलाया
कब शजर ने आदमी को छाँव में अपनी,
न
तरुवर ने कभी रोका किसी को पास आने से।
नहीं
इनसान दे पानी हवा या खाद बागों को,
उन्हें
पावस पिलाते हैं अमिय खुल के खजाने से।
अगर
करता रहे रक्षा सदा पेड़ों व बागों की,
सदा
राहत मिलेगी आपदाओं में बचाने से।
नहीं
रहना है निर्भर आज हैं हालात बारूदी,
वही
इनसान है सम्हले तुरत आगाह पाने से।।
कभी
बैठे रहे भूलो इसे, पर अब उठो जागो,
चले
बिन मंजिलें मिलती, नहीं बातें बनाने से।।
न
हो कल भी हमारा जंग के हालात के जैसा,
यही
वो आग है ‘आकुल’ भड़कती है बुझाने से।।
24 अप्रैल 2026
हर मौसम के अपने गुण है
22 अप्रैल 2026
पेड़ बचाएँ नही छोड़ना, उनको अपने हाल पर
गीतिका
छंद-
मरहट्ठा माधवी
विधान-
29 मात्रीय छंद जिसमें 16, 13 पर यति अंत 212 (रगण) अनिवार्य।
अपदांत
समांत-
अर
लेते
हैं साँसें ये भी अरु,
देते हैं नि:श्वास भर।
पेड़
बचाएँ नही छोड़ना,
उनको अपने हाल पर।
हरियाली
या हरित चित्र जैसा भी तुम बस ढाल लो,
वृक्ष
झूमते हैं हर झौंके पर हो तो यह ध्यान धर।
करें
समर्पित तन मन रोम-रोम अपना ये धरती को,
नंदनकानन
यही बनाते हैं निसर्ग,
संथाल, घर।
विकसित
मरुउद्यान करें ये,
ही यदि हम सब सोच लें।
हर
प्राणी पाले इनको हम,
जैसे पालें जानवर।
‘आकुल’ की है सोच यही बस पेड़ों का संरक्षण हो,
श्रीगणेश
कर भृगु, दुर्वासा, ऋषियों का आह्वान कर।।
-
आकुल
भृगु ऋषि- ये नदियों और वनस्पतियों के रक्षक माने जाते हैं
ऋषि दुर्वासा- ने कल्पवृक्ष की रक्षा के लिए उसके नीचे बैठ कर तपस्या की थी।
21 अप्रैल 2026
दुख-सुख आशा और निराशा
20 अप्रैल 2026
जिद्दी नहीं पिघलते उनका नसीबा
18 अप्रैल 2026
जी तू किसी भी तरह ज़िन्दगी
कुनह- द्वेष, शत्रुता
17 अप्रैल 2026
हेे वागीशा, हंस वाहिनी, वीणापाणि, माँँ सरस्वती
हे वागीशा हंसवाहिनी,वीणापाणि माँ सरस्वती।
16 अप्रैल 2026
दाे कुंडलिया छंद
14 अप्रैल 2026
लता मंगेशकर संगीत का प्रथम स्वर ‘सा’ (षडज) थीं तो आशा भौंसले पाँचवाँ स्वर ‘पा’ (पंचम) थीं
13 अप्रैल 2026
जैसी करनी वैसी भरनी है
11 अप्रैल 2026
घर में रहती शांति, मिल जुल कर हम यदि रहें
यह विभीषिका युद्ध की देती है संदेश
मुक्तकंठा छंद
(ईरान-इजरायल-अमेरिका युद्ध पर)
दुख रहता है सदा न भाई
न मन के मुताबिक चली जिंदगी है
छंद- भुजंग प्रयात
मापनी-
122 122 122 122
समांत-
अरना
अपदांत
कही
बात पर तुम सदा ही ठहरना ।
लिया
हाथ में तो नहीं फिर मुकरना ।।
नहीं
काम होते कई बिन हुनर के,
अगर
कर सको तुम तभी हाथ धरना ।
न
पाना उसे जो न हक़ में तुम्हारे,
न
कोशिश ही’ करना न हद से गुजरना ।
न मन
के मुताबिक चली जिंदगी है,
तुम्हें
ही मुताबिक उसी के सुधरना ।
न
काबिल सदा एक दिन हों मुकाबिल,

