छंद-
रासा
विधान- 16
मात्रीय छंद। जिसमें तीन चौकल अंत 2 गुरु वाचिक अनिवार्य। यति अंत में। लय चौपाई
की तरह।
अपदांत
समांत- आई
दुख
रहता है सदा न भाई।
सुख
से हुई सदा भरपाई।
सुख
जब जब डूबा जीवन में,
दुख
ने आग सदा भड़काई।
दुख
ने चाहा सदा भरोसा,
जब
तक सुख की घड़ी न आई।
आते
ही सुख दुख को भूले,
यह
सुख की है बड़ी बुराई।
क्यों
सीखे ना आकुल सुख से,
दुख
ज्यादा सुख कम सच्चाई ।।
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