13 अप्रैल 2026

जैसी करनी वैसी भरनी है

गीतिका 
मापनी- 222 222 222 // 22 22 22 22 2   

जैसी करनी वैसी भरनी है।
काल परिस्थितियों से बननी है।

मौसम के प्रतिकूल चले जो भी,
तबियत अकसर तभी बिगड़नी है।

कम खा गम खा हद में रहना ही,
वर्ना तो बस चिंता बढ़नी हैं।

बस में है अपने केवल करना,
बाकी तो ईश्‍वर की चलनी है।

क्‍यों ना ऐसे जीवन जियें सभी,
नहीं प्रकृति से कोई ठननी है।। 

11 अप्रैल 2026

घर में रहती शांति, मिल जुल कर हम यदि रहें

छंद- सोरठा 
विधान- दोहे का हूबहू विपरीत यानि 11, 13 पर यति। 
अपदांत 
समांत- ऊकारांत इए 

गीतिका
फूले मगर न श्‍वास, धीरे धीरे घूमिए।
मन का बनें न दास, करना योग न भूलिए।

घर में रहती शांति, मिल जुल कर हम यदि रहें,
रहती कभी न भ्रांति, नहीं बड़ों से रूठिए। 

बच्‍चे वृद्ध जवान, घूमें नित्‍य शाम सुबह,    
घूमें उस दौरान,  कई समस्‍या बूझिए।।

आता सबका दौर, कभी न हारें उम्र से,
करना यह भी गौर, खुशियों को बस ढूँढिए।

जीएँ रख विश्‍वास, मरना शाश्‍वत सत्‍य है,
कर जायें कुछ खास, फिर जीवन से छूटिए।।

सबका रखना मान, सुख-दुख तो मेहमान हैं,
जिएँ सदा यह जान, समदर्शी बन पूजिए ।।

छल प्रपंच से दूर, ‘आकुल’ की यह सीख रह,
क्‍यों कर तनिक सबूर, खुद से थोड़ा पूछिए ।। 

यह विभीषिका युद्ध की देती है संदेश

 मुक्‍तकंठा छंद

(ईरान-इजरायल-अमेरिका युद्ध पर)

1
यह विभीषिका युद्ध की, देती है संदेश।
प्रकृति करेगी संतुलन, छोड़ा मार्ग न लेश ।।
बाढ़, आपदा, रोग, क्षति, आवासन सब ध्‍वस्‍त,
ले डूबेगी सम्‍पदा जिसके लिए ये’ क्‍लेश ।।
जिसके लिए ये’ क्लेश, रह रहा किस भ्रम में वह ।
छीन शांति अरु चैन, न ‘आकुल’ मिलनी है यह ।।

2
वैसे भी जीवन रुका, रुके सभी अभियान ।
सभी योजनाएँ रुकीं, नष्‍ट सभी अनुमान ।।
यह विभीषिका युद्ध की, हुई भयावह रोज़,
पहुँचें अपने घर सभी, यह ही बस है ध्‍यान ।।
यह ही बस है ध्‍यान, बचे जीवन कैसे भी ।
कर लेंगे संघर्ष, बचा है क्‍या वैसे भी ।।  


दुख रहता है सदा न भाई

छंद- रासा
विधान- 16 मात्रीय छंद। जिसमें तीन चौकल अंत 2 गुरु वाचिक अनिवार्य। यति अंत में। लय चौपाई की तरह।
अपदांत
समांत- आई 

दुख रहता है सदा न भाई।  
सुख से हुई सदा भरपाई।

सुख जब जब डूबा जीवन में,  
दुख ने आग सदा भड़काई।

दुख ने चाहा सदा भरोसा,
जब तक सुख की घड़ी न आई।

आते ही सुख दुख को भूले,
यह सुख की है बड़ी बुराई।

क्‍यों सीखे ना आकुल सुख से,
दुख ज्‍यादा सुख कम सच्‍चाई  ।। 

न मन के मुताबिक चली जिंदगी है

 छंद- भुजंग प्रयात

मापनी- 122 122 122 122

समांत- अरना

अपदांत

 

कही बात पर तुम सदा ही ठहरना ।

लिया हाथ में तो नहीं फिर मुकरना ।।

 

नहीं काम होते कई बिन हुनर के,

अगर कर सको तुम तभी हाथ धरना ।

 

न पाना उसे जो न हक़ में तुम्‍हारे,

न कोशिश ही’ करना न हद से गुजरना ।

 

न मन के मुताबिक चली जिंदगी है,

तुम्‍हें ही मुताबिक उसी के सुधरना ।


न काबिल सदा ए‍क दिन हों मुकाबिल,

इसी हौसले से सदा तुम निखरना ।।  

7 अप्रैल 2026

दो पद

पद-1            

विधान- छंद शृंगार + पूरक पंक्ति सरसी एवं द्विपद सरसी (पृथक् तुकांत)

विधान- शृंगार- 16 मात्रा। आदि त्रिकल-द्विकल, अंत द्विकल-त्रिकल, अंत गुरु लघु

विधान- सरसी- मात्रा भार- 27; 16 (चौपाई)+11(दोहे का सम चरण) पर यति।

बने अब ऐसा इक संसार।

जीवन में सब सभ्‍य शिष्ट हों रख आचार विचार ।। 

सौर, पवन ऊर्जा जल-स्रोतों, खेती पर हो काम।  

उपनिवेशिकाएँ विकसित हों हर पथ के हों नाम ।।

वन उपवन सुरभित संरक्षित हों अब हर संथाल।

दिव्‍यांगों असहायों की हो समुचित सार सँभाल ।।

शिक्षा संस्‍कृति, धर्म, पर्व पर दिखे सदा सद्भाव ।

‘आकुल’ जीवन का उद्देश्‍य हो, सर्वधर्म समभाव ।।


पद-2

विधान- छंद चौपई + पूरक पंक्ति सरसी एवं द्विपद सरसी (सम तुकांत)

विधान- चौपई- 15 मात्रा। आदि गुरु , अंत गुरु लघु से। चौपाई के अंत मे गुरु को लघु कर देने से यह छंद सिद्ध होता है, इसलिए लय चौपाई की।  

विधान- सरसी- मात्रा भार- 27; 16 (चौपाई)+11(दोहे का सम चरण) पर यति।

हो प्रभु ऐसा इक संसार।

इक सपना वसुधैवकुटुँबकम का हो अब साकार।। 

बँधें न बाँध जहाँ नदियों के, तट हों तीरथ द्वार।

मिलें न नदियाँ कलिमल लेकर, मिटे सिंधु का खार ।।

खेल, योग व्‍यायाम, प्रशिक्षण, के हों ज्ञान विहार ।

हो अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता व आपस में सहकार।।

‘आकुल’ सर्वे भवन्‍तु सुखिन:, हो संकल्‍प विचार ।

सर्वधर्म समभाव दिखे हर तीज और त्‍योहार।।   


17 मार्च 2026

परम्‍पराएँँ बेमानी सी लगती हैं

 (प्रदत्त शब्द- परम्परा, रीति, रिवाज, प्रथा)

छंद- कुकुभ (मात्रिक)
विधान- मात्रा भार-30. 16, 14 पर यति, अंंत 2 गुरु से ।
पदांत- सी लगती हैं
समांत- आनी
..
अंकुश ना हो #परम्पराएँ, बेमानी सी लगती हैं।
भावुकता में बही जिंदगी रूमानी सी लगती हैं ।1।
..
कर गुजरें फिर इक दिन अपने और पराये मिल जाते,
#रीति_रिवाज_प्रथाएँ सब तब बेगानी सी लगती हैं।2।
..
पल में बनते रिश्ते, उगते हैं सपनों के #डेफोडिल,
टूटें दिल तो बिना लकीरें पेशानी सी लगती हैं।3।
..
बदलें ताशों के पत्तों सी दाँव लगाते रिश्तों को,
अनपढ़ नादानों के जैसी बचकानी सी लगती हैं।4।
..
परम्परायें नहीं ढाई’ दिन, के झौंपड़ सी हैं 'आकुल' ,
ढाई आखर प्रेम फले तो आसानी सी लगती हैं ।5।
..
..
डेफोडिल- एक चमकीले पीले या सफेद रंग का वसंत ऋतु में खिलने वाला फूल है, जो नई शुरुआत, आशा, पुनर्जन्म और खुशहाली का प्रतीक माना जाता है।