गीत लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
गीत लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

2 सितंबर 2026

मेरा अभिनव हिन्‍दुस्‍तान

गीत
(छंद- चौपई)

है अभिनन्दन आयुष्मान।
मेरा अभिनव हिन्दुस्तान।।

हो बैसाखी न संविधान,
हो उत्कर्ष गणतंत्र विधान,
गौरवान्वित देश समग्र,
नवोन्मेषीय अभ्युत्थान।

है अ‍भिनन्दन हिन्दुस्तान ।।

कन्याकुमारि से कश्मीर,
रामलला का जन्मस्थान,
सम्प्रभुता से विकासशील,
वंदे भारत हो गुणगान।

मेरा अभिनव हिन्दुस्तान ।।

कण-कण इसका भारत रत्न,
हमको इस पर है अभिमान,
’आकुल’ का वंदन साष्टांग,
मेरा भारतवर्ष महान्।

है अभिनन्दन हिन्दुस्तान ।।  

(सद्य प्रकाशित गीत संग्रह 'मेरा अभिनव हिन्दुस्तान' से)

9 जून 2026

सर्वधर्म समभाव बना कर रहना चाहिए

 गीतिका

छन्द- गगनांगना
विधान- 25 मात्रीय, 16, 9 पर यति, अन्त 212
पदान्त- चाहिए
समान्त- अहना
सर्वधर्म समभाव, बना कर, रहना चाहिए ।
स्वस्थ रहें हम, कष्ट पालना, सहना चाहिए ।
खान-पान पर अब आवश्यक, प्रथम लगाम हो ,
स्वच्छ हो, न अब हवा प्रदूषित, बहना चाहिए ।
निकलें तभी, जरूरी हो जब, बाहर काम से,
दुर्घटनाएँँ, कम हों सबसे, कहना चाहिए ।
स्वर्ग यहीं, यदि बचे रहोगे, सब यह ठान लें,
नहीं दुराग्रह, नहीं हठाग्रह, दहना चाहिए ।
चलें सुरक्षित, धीमे वाहन, चला रहें सजग,
कहीं न घर अब, कुछ आलस में, ढहना चाहिए ।।

13 मई 2026

माँ तो बस माँ जैसी होती

 माँ तो बस माँ जैसी होती ।

अमृत घोल पिलाया माँ ने ।
हाथों सदा झुलाया माँ ने ।
उँगली पकड़ चलाया माँ ने ।
रोने पर बहलाया माँ ने ।।

कभी नहीं वह धीरज खोती ।
माँ तो बस माँ जैसी होती ।।

किसने मोल किया है माँ का ।
इक अनमोल हिया है माँ का ।
नहीं तराजू बनी अभी तक,
जिसने तोल किया है माँ का ।  

फीके पड़ते हीरे मोती ।
माँ तो बस माँ जैसी होती ।।

नहीं मिला सुख माँ का जिसको ।
मिलती है सपनों में उसको ।
घर में इक तसवीर लगी हो,
देख न आँखें थकती जिसको ।।

माँ ही है केवल इकलौती । 
माँ तो बस माँ जैसी होती ।।   

29 अप्रैल 2026

हैं अनगिनत रूप नृत्य के भारत देश में

गीत
हैं अनगिनत रूप नृत्य के भारत देश में।
नृत्य से ही है समृद्ध सांस्कृतिक विरासत देश में।।

कुचिपुड़ी, मणिपुरी, कथकली, मोहिनीअट्टम।
कथक, ओडिसी, सत्तरिया, कजरी कालीयट्टम।।
पौपिर, राउफ, यक्ष गान, छऊ, गरबा, डांडिया।
तमाशा, गिद्दा, भांगड़ा, बिहू, कालबेलिया।।

संगीत नृत्य, गीत से ही हैं लोग जाग्रत देश में।
नृत्य से ही है समृद्ध सांस्कृतिक विरासत देश में।
हैं अनगिनत रूप नृत्य के भारत देश में।।

मुखौटा, युद्ध नृत्य, राखल, राई नृत्य, चौंगली।
लास्य, भवई, रास, घोड़ी, चरी नृत्य, कीकली।।
तेरह ताली, चारकूला, नौटंकी, बागला।
वैंगा, दोहाई, घूमर, लावणी जै, सांगला।।

लोकगीत नृत्य बोलियों की है रिवायत देश में।
नृत्य से ही है समृद्ध सांस्कृतिेक विरासत देश में।
हैं अनगिनत रूप नृत्य के भारत देश में।।
..00..

(मुक्तक- छंद सरसी)
चलो नृत्य से ही बतलायें, मौन हमारा ध्येय।
एक एक ग्यारह बन कर हम, क्यों ना बनें अजेय।
लड़-भिड़ कर हम कौन शिखर छू लेंगे सोचें आज,
सूर्य सदृश बन कर क्यों जलना, चाहो तुम अज्ञेय।।
अज्ञेय – समझ से परे



18 नवंबर 2025

जीवन एकांकी भी तो है

जीवन खुश रहना ही तो है।
जीवन दुख सहना भी तो है।।

महलों के क्‍या ख्‍वाब देखना।
अपनों से क्‍या लाभ देखना।
कम से कम इतना ही हो  बस,
जीवन की मुस्‍कान देखना।

जीवन मन भरना ही तो है।
जीवन हठ करना भी तो है।।

चंचल मन ये रुका नहीं तो
हठधर्मी यदि झुका नहीं तो
होंगे दंगे भी फसाद भी,
कर गुजरेगा चुका नहीं तो

जीवन कुछ पाना ही तो है।
जीवन कुछ खोना भी तो है।

नभ में तो पतंग भी कटतीं
मेघावलिया तक भी फटतीं
तारे टूटें अंतरिक्ष में,
मान्‍यताऍ बढ़तीं कम घटती

जीवन सदाचार ही तो है।
जीवन अनाचार भी तो है।।

चरम पहुँचना ध्‍येय नहीं हो
द्वेष, क्‍लेश, स्‍तेय नहीं हो
परिभाषा सुख की आवश्‍यक,
दुख कैसा भी हेय नहीं हो।

जीवन एकाकी ही तो है।
जीवन एकांकी भी तो है।। 

x

6 नवंबर 2025

चंद्र विजय अभियान

विश्‍ववाणी हिंदी संस्‍थान अभियान, जबलपुर, भारत के सौजन्‍य से विश्‍व कीर्तिमान बनाता साझा काव्‍य संकलन 'चंद्र विजय अभियान' में 5 देशों, 51 भाषाओं / बाेलियों 213 साहित्‍यकारो/ कवियों/ रचनाकारों की कविताओं का गुलदस्‍ता प्रकाशित हुआ। गौरव है कि इस विश्‍वकीर्तिमान से सुसज्जित काव्‍य संकलन मे 'आकुल' को स्‍थान मिला। उनकी रचना 'गीत - जय हो' के नाम से प्रकाशित हुई- 

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन जय हो

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन जय हो।  
भारत हुआ गौरवान्वित 
इसके हर जन की जय हो।
भारतीय अंतरिक्ष..........

कलियुग में संगठित हुए जो
विजय उसी ने पाई।  
सदा सफलता की कुंजी है
असफलता नहिं पाई।
उतरा सकुशल चंद्रयान 
फहराया वहाँ तिरंगा,
हम भी श्रेष्‍ठ सिद्ध हुआ
ऐतिहासिक कीर्ति लिखाई।

विश्‍व चकित हो देख रहा था
 उस पल क्षण की जय हो।  
भारतीय अंतरिक्ष..........

गीता, वेद, पुराण, उपनिषद्
ग्रन्थ सिद्ध भारत में।
मंत्र शक्ति से साक्षी है
ब्रह्मास्‍त्र बना भारत में।
शून्‍य दिया भारत ने वैदिक-
गणित सिद्ध भारत में।
उसी गणित से चंद्रारोहण
सिद्ध हुआ भारत में।  

योग शान्ति के नायक की 
तकनीक चिरंतन जय हो।  
भारतीय अंतरिक्ष..........

अनुभूति के ठंडा पेय विशेषांक में आकुल की रचना

महफिल सजती शरबत से

 
नौ रस जग में पर शरबत रस का ना सानी।
गरमी में शरबत अमरित, मरुधर में पानी।   
ठंडक मिलती शरबत से....

अमरस, कट्ट, पना, ईखरस, लस्‍सी, छाछ
गर्मी में पीते ही इनको खिलती बाछ
नारंगी मौसम्‍बी फालसे और शिकंजी बेल    
शरबत के आगे हो जाते गोला चुसकी फेल
हर फल से बन जाता है शरबत आसानी।
लू ना लगती शरबत से....

शरबत को महँगा करना हो उसे सजा दो
नीबू, द्राक्ष, खस गुलाबजल से महका दो
पहना दो कुछ मुकुट सरीखे फल के कटके
जाम में होता शरबत का प्रभाव ही हट के
शरबत बन जाता है फिर शरबती रानी।
म‍हफिल सजती शरबत से....   

स्‍वाद है जिह्वा तक अंदर तक असर करे
बर्फ से ठंडा शरबत गला तरबतर करे
ठंडाई, कुल्‍फी का मौसम गरमी ‘आकुल’
शरबत तन में पूर्ति पानी की जबर करे
पल्‍प-चाशनी से बन जाता शरबत पानी।
रंगत बनती शरबत से....

 

18 सितंबर 2024

हिन्दी, से ही अपना हिन्दुस्तान है

अपनी शान है
अपनी आन है।
हिन्दीसे ही अपना हिन्दुस्तान है।

रात दिन यह बढ़ रही है।
अब शिखर पर चढ़ रही है।
कीर्तियाँ भी गढ़ रही है।
हिंदी, संस्कृत का इक वरदान है।
हिन्दीसे ही अपना हिन्दुस्तान है।]
अपनी शान है।
अपनी आन है।
हिन्दी, से ही अपना हिन्दुस्तान है।

बादलों के पार भी है।
सागरों के पार भी है।
मानता संसार भी है।
हर इक, बोलियों में इसका मान है।
हिन्दीसे ही अपना हिन्दुस्तान है।]
अपनी शान है।
अपनी आन है।
हिन्दी से ही अपना हिन्दुस्तान है।

सरहदों पर चल रही है।
हर घरों में पल रही है 
धड़कनों में बस रही है।
अपनी, संस्कृति का यह अभिमान है।
हिन्दीसे ही अपना हिन्दुस्तान है।]
अपनी शान है।
अपनी शान है।
हिन्दी से ही अपना हिन्दुस्तान है।
-::-

 (पहली या दूसरी पंक्ति को सेलेक्‍ट करें और गीत सुनें)

https://www.smule.com/recording/rajeshlad1970-kitni-khubsurat-ye-tasveer-hai/547655538_4939565742?channel=Whatsapp

15 अगस्त 2024

पर्व स्वतंत्रता दिवस मनाएँ


माँ को भारती को नमन करते हुए स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएँ।

देशभक्ति गीत
==============
स्वतंत्रता दिवस मनाएँ
==============
देशभक्ति गीत
स्वतंत्रता दिवस मनाएँ
==============
चलो भूल, शिकवे उलाहना, पर्व स्वतंत्रता दिवस मनाएँ।
आज तिरंगा गाँव-गाँव पथ, शहर-शहर घर-घर फहराएँ।

याद करें उनके बलिदानों की कहानियाँ किस्से दिन भर,
गायें उन गीतों को जिनने भरा हौसला जिनके दम पर,
कैसे पाई आजादी उन वीर शहीदों के दम सुन कर
उगलें विष चाहे कितने ही सर्प सदा फुफकारें, तन कर
कर्मठ, वीर न डिगते पथ से क्यों न कृतघ्न कह्र बरपाएँ।
आज तिरंगा गाँव-गाँव पथ, शहर शहर घर-घर फहराएँ।

बीत गई वो बात गई, खोया तो बढ़ कर ही है पाया।
खेल, कला, संस्कृति, तकनीकी जग में है परचम फहराया।
महिलाएँ अब सजग, सशक्त, समर्थ और शिक्षित हो उभरीं,
कोई क्षेत्र नहीं जिसमें ना पहुँचीं हैं प्रभुत्व दिखलाया।
मातृभूमि पर वीराओं ने वारे पूत वह कथा सुनाएँ ।
आज तिरंगा गाँव-गाँव पथ, शहर शहर घर-घर फहराएँ।
आतंकवादियों भितरघातियों के दंगे अब ना सहना है।
दुष्कर्मियों, घूसखोरों, भ्रष्टों के अब हर गढ़ ढहना है।
देशप्रेमियों, नव पीढ़ी को आज जरूरत है अवसर की,
महँगाई जनसंख्या पर अंकुश हमको करके रहना है।
रोज़गार के अवसर हर तबके को दे कर खुशियाँ पाएँ।
आज तिरंगा गाँव-गाँव पथ, शहर शहर घर-घर फहराएँ।

ले संकल्प सभी कुछ हर घर आज देश का मान बढ़ाएँ।
प्रकृति मुसकुराए धरती पर इतने सारे पौध लगाएँ।
त्योहारों का देश हमारा, हर दिन होली दीवाली से,
गले मिलें हर पर्वोत्सव पर फिर क्यों मन से वैर न जाएँ?
योग ध्यान चिंतन मंथन हो संत-समागम पथ दिखलाएँ।
आज तिरंगा गाँव-गाँव पथ, शहर-शहर घर-घर फहराएँ।
चलो भूल, शिकवे उलाहना, पर्व स्वतंत्रता दिवस मनाएँ।

14 अगस्त 2024

कब तक हम आजादी का यूँ, जश्‍न मनाएँगे?

कब तक हम आजादी का यूँ, जश्‍न मनाएँगे?
बढ़ते आक्रोशों के यक्ष प्रश्‍न दबाएँगे,

मुड़ कर देखें चहूँ दिशाएँ हवा नहीं सुरभित,
क्‍या कागज़ के फूलों से निधिवन सजवायेंगे ?
कब तक हम..........

द्रोपदियाँ लुट रहीं देखते दु:शासन तांडव,
अभी न कोई कृष्‍ण यहाँ है विवश भद्र पांडव,
द्यूत शकुनि का अंध बने धृतराष्‍ट्र कई बैठे,
भीष्‍म धराशायी होगें चीखेंगे कारंडव,
कितनी आहुतियों से कब तक हवन कराएँगे?
कब तक हम..........

घर घर में फहराएँ झंडा चलो और इक बार,
नहीं शत्रु का दंभ मिटेगा गठबंधन सरकार,
और एक महाभारत के हैं अब आसार यहाँ,
घिरा हुआ भारत है भीतर-बाहर हाहाकार, 
कोविध अपनी संस्‍कृति का वटवृक्ष लगाएँगे?
कब तक हम..........

प्रकृति ढा रही कह्र मच रही चीख पुकारें,
मुफ्त योजनाओं से दिवालिया हैं सरकारें,
नहीं दवायें, वेतन, रोजगार से दुखी प्रजा,
फिर हारी है जनता फैलाती भ्रम सरकारें,
जन हुतात्‍माओं के क्‍या अब बुत लगवायेंगे?
कब तक हम ..........

कब तक हम आजादी का यूँ, जश्‍न मनाएँगे?



20 जुलाई 2024

मिले पकोड़ों के कुनबे से

http://www.anubhuti-hindi.org/sankalan/2food/garam_pakode/geet/Aakul.htm

                        मिले पकौड़ों के कुनबे से

 
 मिले पकौड़ों के कुनबे से गए एक पिकनिक
सुनी बात रुक कर के चुपके से उनकी चिकचिक

गोभी, मिर्ची, मटर, पनीर
आलू, की थी अपनी पीर
चटनी हरी, टमैटो सॉस
फुलबड़ि‍यों की भी थी भीड़
बढ़े हाथ लेने को मचले मिली खुशी हार्दिक

दर्द हमारा आँसू उनके
खाए गर्मा-गर्म
नहीं सोचता है कोई क्यूँ
क्या है धर्म-अधर्म
रौरव नर्क मिला कुछ को कम कुछ को जरा अधिक

चटनी, ने भी दर्द किया फिर
बयाँ सभी के बीच
पीसा हमें निचोड़ा नीबू
सहा आँख को मींच
तुमसे मिल कर गले पिसेगें फिर दाँतों में क्विक

बच जाओ तो कहना घर या
त्योहारों शादी में
खुश रहना जीवन में करना
शोक न बरबादी में
परहित हो तो द्वंद्वयुद्ध में फिर कैसी झिकझिक

- आकुल
१ जुलाई २०२४
अनुभूति जुलाई 2024 के 'पकौड़ेे विशेषांक' में प्रकाशित गीत 


 

26 जून 2024

चलो शरबती घूँट भरें

गीत
शरबत पीने के ढूँढें हम, कई बहाने ।
महिफल हो पिकनिक हो होटल, या मयखाने। 
सभी बुलाते पीने को किस-किस की मानें । 

पीते तो गुस्‍सा भी हैं
पर रक्‍त चाप बढ़ने का डर
पड़े कलेजे को ठंडक अब
ऐसा कुछ करते हैं पर
आदत पड़ती बुरे व्‍यसन की 
जब जब जिसको भी देखा
क्‍लेश कलह से जीवन में 
बरबाद हुए कितने ही घर 
संस्‍कार बिगड़ें उनकी तो राम ही जाने,
चलो शरबती घूँट भरें और लंबीं तानें ।

बच्‍चों में उल्‍लास 
जमाने भर का देखा
कोल्‍ड ड्रिंक का चस्‍का 
नवपीढ़ी में देखा
कहाँ बुजुर्गों को
ठंडाई लस्‍सी छाछ
शरबत मिल जाए बस
खिल जाती है बाछ
खट्टी मीठी बातें तो बस नीबू जाने
चलो शिकंजी को ठंडाई समझें छानें ।