कर रहे हैं।
सुन्दर कलेवर में सजी ‘गीत प्रदक्षिणा’ में गेयता की दृष्टि से सजे गीतों पर रचनाकारों ने छन्दों पर भी क़लम चलाई है। विधाता, सरसी, सार, चौपाई, दोहा, अरुण, सुमेरु, दिग्पाल, विष्णुपद, ताटंक, गीतिका, लावणी आदि प्रचलित छन्दों ने संकलन में जहाँ एक कल-कल नाद दिया है, वहीं प्रभंजन, लाय, तूफ़ानों के आवेगों, मन के विचलन को भी पृष्ठांकित किया है। कुछ अनसुलझे यक्ष प्रश्न, भ्रष्टाचार, जीवन शैली आदि पर कटाक्ष से रचनाओं में पैनापन भी दृष्टिगोचर हुआ है।
राष्ट्र वन्दना करती सुश्री अंजु कपूर गांधी, डॉ. कमला पति ‘गौतम कमल’, छन्दकार राकेश मिश्र, श्री ओमप्रकाश गावशिन्दे ‘ओम’, श्री गुप्ता कुमार सुशील ‘गुप्त अक्स’ आदि के गीत; मातु वन्दना पर डॉ. अनामिका मिश्रा, डॉ. संजीव नाईक, आदि की रचनाएँ रोमांचित करती हैं। डॉ. उमाशंकर शुक्ल ‘शितिकंठ’ जी का यक्ष प्रश्न ‘कैसी मातृभूमि हम अगली पीढ़ी को दे जाएँगे?’ को आगाह के रूप में लिया जा सकता है।
आज जहाँ आतंक, प्रदूषण, हिन्दी में
सम्मानजनक सम्प्रेषणीयता की कमी, जन सामान्य के लिए अव्यवस्थाएँ, सरकार की
अनदेखियाँ, पाश्चात्य शैली का बढ़ता प्रभाव, दुष्कर्म, भ्रष्टाचार, पर्यावरण
आदि की समस्याओं को बताती, सुलझाती साथ ही अपने मन के दर्द, प्रेम की असफलता,
रिश्तों में दूरियाँ आदि कमोबेश काव्य के नवरस से आलोड़ित सभी विषयों पर
रचनाकारों ने अपनी व्यथा रची है, वहीं श्री प्रमोद कुमार हंस, श्री दिनेश पाण्डेय,
श्री धीरेन्द्र द्विवेदी की रचनाएँ नयापन लिए सोचने को विवश करती हैं। बसन्त,
पावस, वृक्ष, बचपन, आदि पर रचनाएँ हमें संतोष अनुभव कराती हैं ।
यह संकलन ही नहीं समेकित रूप में सभी
रचनाकारों का एक अनुष्ठान भी है, जो देश की दशा-दिशा को मोड़ने की सामर्थ्य रखता
है। यह गीत समागम है और चहूँ दिशा पुस्तक रूप में ‘गीत प्रदक्षिणा’ जाग्रति के
लिए जन-जन नाद है।
अपरिहार्य रूप से पुस्तक में किये
गए कतिपय संशोधनों से विचलित न हों। उत्तम रचनाएँ सर्वोत्तम प्रस्तुत हों, अभिलाषा
रही, फिर भी कुछ हठाग्रहों से रचनाएँ
हूबहू प्रकाशित की हैं।
शीघ्र ही मुक्तक-लोक प्रस्तुति सप्तपदी
का अनुष्ठान
भी मूर्तरूप ले, ऐसी शुभकामनाओं के साथ वाणी को विश्राम देता हूँ।
किमधिकम्,
कोटा, राजस्थान, डॉ. गोपाल कृष्ण भट्ट ‘आकुल’
सम्पादक
20
जुलाई, 2026




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