ईश्वर प्राप्ति का सबसे सरल माध्यम है- गीत

नादब्रह्ममयं ज्ञानं गीतेनैवाभिपूज्यते ।
                
गानक्रियाप्रमोदेन स्वयं गच्छन्ति देवता ।। -केलिमाल

भावार्थ- नाद (ध्वनि और संगीत) ही ब्रह्म (ईश्वर) का स्वरूप है। गीत और संगीत के माध्यम से ही ईश्वर की वास्तविक पूजा होती है। जब साधक या भक्त पूर्ण आनन्‍द के साथ संगीत और गायन की क्रिया में लीन होता है, तो देवता भी स्वयं उसके पास खिंचे चले आते हैं। -स्‍वामी हरिदास

            मन के निस्‍सृत भावों की निर्झरणी हैं गीत। अनन्‍त काल से स्‍थापित काव्‍य की यह शैली गुंजायमान अक्षर ब्रह्म के साथ जुड़ कर पृथ्‍वी की परिक्रमा कर रही है। भावों की निबन्‍धनी में बँधे रससिक्त गीत समय चक्र के उत्‍स (निर्झर) के कल-कल नाद का एक हिस्‍सा बन कर संगमन करते हुए युगों से प्रदक्षिणा कर रहे हैं।

इतिहास साक्षी है गीतों ने काल की गति को एक वेग दिया है। इसी वेग ने मनुष्‍य के संवेगों के साथ मिल कर सीमाएँ तोड़ीं, सभ्‍यता और संस्‍कृति को मार्ग बदलने के लिए विवश किया है। अक्षुण्‍ण अखण्‍ड अक्षर ब्रह्म ने लय के साथ बँध कर, जहाँ आवेग दिया, वहीं उसके ज्वार को शान्‍त भी किया है। यह प्रदक्षिणा अनवरत चलती आ रही अपने संग, समय के कलुष को धोते हुए संस्‍कृति के पवित्र भावों को सहेजती हुई, वेदमाता गायत्री और देवी वागीशा माँ सरस्‍वती की आराधना में संलग्न हुई है।

वेदांगों की चतुरंगिनी (शिक्षा, व्‍याकरण, छन्‍द और निरुक्त) से निकली काव्‍य की यह धारा अनेक सुरसंगमा विधाओं के लिए नृत्‍य और संगीत के साथ अपने विविध रूपों में स्‍थापित हुई है। वेद शास्‍त्रों से चली आ रही यह प्रदक्षिणा भले ही कई जगह विचलित हो कर भ्रष्‍ट हुई है, पर अपनी परम्‍परा का निर्वहन करती हुई समय-समय पर अनेक रूपों में शृंगारित हुई और अबाध आज भी अपने नवीन रुप में दिखाई देती है। भावों के प्रस्‍फुटित शब्‍दों से निकली सुख, दुख, उल्लास आदि लिए नवरसों का रसपान करती हुई संगीत में पिरोई जाती है। छन्‍दों में बँध कर वह सिद्ध हुई है, अपनी गेयता से संगीत में निबद्ध होती हुई चर्चित भी हुई है।

ये गीत ही हैं, जो दस थाटों के भार को वहन करते हुए, 8 गणों के प्रतिमानम् (बाट) से संतुलित हो कर श्रेष्‍ठ से श्रेष्‍ठतम सज कर सुमधुर लय में दुनिया में छाए हैं। इसका इससे बड़ा क्‍या दृष्टान्‍त हो सकता है कि आज यह नहीं कहा जा सकता है कि अब तक कितने गीतों का सृजन हुआ है। ‘ए आई’ भी इसकी खोज और गणना करने में असमर्थ है।

भारतीय धर्मग्रन्‍थों मुख्‍यत: सामवेद में गीत और संगीत को ईश्वर प्राप्ति का सबसे सरल माध्यम माना है। सामवेद को स्वयं "गीतों की पुस्तक" कहा जाता है।

स्‍वयंसिद्ध काव्‍य शैली गीत का यह संकलन रचनाकारों की अपनी प्रतिनिधि गीतों से सजा, मुक्तक-लोक द्वारा प्रस्‍तुत, सप्‍तपदी से एक डग दूर, अपनी प्रदक्षिणा के मार्ग में हमारे समक्ष है। मुझे विश्‍वास है कि मुक्‍तक-लोक के पूर्व पाँच संकलनों के क्रम में ‘गीत प्रदक्षिणा’ का षष्‍ठीपूर्ति अनुष्‍ठान भी अवश्‍य सिद्ध होगा ।

शुभकामनाएँ,

20 जुलाई, 2026                                            डॉ. गोपाल कृष्‍ण भट्ट ‘आकुल’

संदर्भ- 

केलिमाल- संगीत सम्राट तानसेन के गुरु प्रख्‍यात सन्‍त एवं संगीतज्ञ स्‍वामी हरिदास जी के ‘संगीत के पदों’ का संग्रह है।

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