छंद- पद (चौपाई परिवार)
विधान- चौपाई + सार छंद से पूर्ति एवं शेष द्विपदियाँ सम तुकांत।
कितना सबको समझाएँ ।
ढाई आखर प्रेम सत्य है, क्यों स्वीकार न पाएँ ।।
नारी पर कैसे श्रद्धा हो, पढ़ी लिखी पतिताऍं ।
प्रेमाकर्षण वशीभूत हो, जाँ जोखिम में लाएँ ।।
जन्म दिया पाला पर गलती कहाँ हुई बतलाएँ ।
सुनी, पढ़ी देखी ऑंखिन से, डरा रही घटनाएँ ।।
नहीं सभ्यता कहती है यह, कब संस्कार सिखाएँ ।
चलें लीक पर भले नहीं पर, दीवारें ना ढाएँ ।।
क्रोध मोह माया मत्सर सब, तन से चिपटे जाएँ ।
यदि प्रभु से नाता जोड़ो तो, पहले इन्हें हटाएँ ।।
बिगड़ें खान पान दिनचर्या, आती हैं बाधाएँ ।
प्रेम अगर निश्छल है ‘बाकुल’, सिद्ध करें गुण गाएँ ।।
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