11 मई 2026

मदिरा सवैया पर दो मुक्तक

छंद- मदिरा सवैया (7 भगण + गुरु)

मुक्तक-1
कर्म बिना कब शीर्ष मिला बिन कर्म कभी गति पा न सके।
शिक्षित ही समझे दुनिया बिन शिक्षक के मति पा न सके।
मूर्ख करे बस तर्क सुजान कभी न करे तकरार कहीं,
सत्य यही अति की गति भी तय कर्म करे यति पा न सके।

मुक्तक-2
जो भरता घर को शठ के दम मीत सुसंगति पा न सके।
जो करता खल संगत वो जग में सुख संप्रति पा न सके।
शीर्ष चढ़े वह वैभव में रह ‘आकुल’ का कहना भ्रम है,
जो धन के मद चूर रहे वह जग की सम्मति पा न सके।

यति– विश्राम; संप्रति- वर्तमान; सम्मति- अनुज्ञा, मत
भगण- 211 (गुरु लघु लघु)

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