मुक्तकंठा छंद
1
बल, मति, धन, सामर्थ्य अरु, वैभव देय अनन्त।
पर्व अनन्त चतुर्दशी, पूजें अच्युत मंत।
दृढ निश्चय कर आज से, जियें वर्ष पयंन्त ।।
जियें वर्ष पर्यन्त, मौन से करें शुचित मन।
ताकि न माया मोह, करे बाधित बल, मति, धन।।
2
करें विसर्जन आज ही, गणपति को सब लोग।
पुन: बुलायेंगे प्रभू, बने योग संयोग।
कृपा रखें सब भक्त पर, क्षमा करें सब भूल,
यथायोग्य सेवा हुई, यथाशक्ति रख भोग ।।
यथाशक्ति रख भोग, किया शृंगार सुदर्शन।
गणपति को साष्टांग, नमन कर करें विसर्जन ।।

