गीतिका
छंद- दिग्पाल
मापनी- 2212 122 2212 122
पदांत- रही हैं
समांत- अगा
बरसात की झड़ी अब, गर्मी भगा रही है।
ठंडी हवा सभी की, खुशियाँ जगा रही है।1।
हैं दूर तक ढकी इक, जल से भरी घटा भी,
बचती तड़िल्लता से, फेरे लगा रही है।2।
बच्चे घरों के' बाहर, ले कागजों की कश्ती,
तैरा रहे मगर कुछ, वर्षा ठगा रही है।3।
पेड़ों की’ डालियों पे, झूलें खगों की’ टोली,
दादुर हैं चुप मगर पिक, मल्हार गा रही हैं।4।
‘आकुल’ न छत न घर हैं, मुश्किल सदा उन्हीं की,
बरसात हर दफा ही, करती दगा रही है।5।