1
दाँतों
को रखिए सदा, स्वच्छ दु्र्गंधहीन।
खाएँ
कटु, मिष्ठान्न कम, कहें शास्त्र
प्राचीन।
कहें
शास्त्र प्राचीन, अगर दातुन कर पाएँ।
विषहर
नीम बबूल, मसूढ़े स्वस्थ बनाएँ ।।
होना
है नीरोग, रखें निर्मल आँतों को ।
और
दुर्गंधहीन, रखें सदैव दाँतों को ।।
2
ओने-कोने में फिरे, करे लार से नर्म।
लिपट-लिपट
कर प्रेम से, करती अपना कर्म ।
करती
अपना कर्म, भले ही निर्ममता से ।
दाँत
रहें हर स्वच्छ, जीभ की कर्मठता से।
रहना
उनके साथ, जिंदगी भर हैं ढोने।
करते ज्यों नित साफ, घरों के ओने-कोने ।।
3
कहते हैं बत्तीस हों जिसके मुँह में दाँँत।
फलता है वह जो कहे, पंडित जी की भाँँत।।
पंडित जी की भाँँत, जीभी जो चले सर्वदा।
दाँँत काटती जीभ, फँसे दाँँतों में करदा।।
भोजन भी बेस्वाद, ग्रस्त रोगों से रहते।
मोती जैसे दाँँत झड़ें जल्दी हैं कहते।।
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