13 अक्टूबर 2026

जगह-जगह हों जागरण

 मुक्तकंठा छंद-

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1 (शब्द - जागरण)
जगह-जगह हों जागरण, सजतेे हैं पांडाला।
थापित हों माँँके कई, रूप स्वरूप विशाल।
चोला चढ़े सिँँगार हो, नया लगे नित भोग,
धूप-दीप-नेवेद्य से, दमके मात सुभाल।।
दमके मात सुभाल, आरती शाम सुबह हों।
करें डाँँडिया नृत्य, जागरण जगह-जगह हों।।
2 (शब्द - जगराता)
माता के दरबार में, भक्त झुकाएँँ माथ।
जगराते में बैठ कर महिमा गाऍं साथ ।
माँँ का कर गुएागान सब, पाते हैं आशीष,
सर्वधर्म समभाव को, इससे बड़ा न पाथ।।
इससे बड़ा न पाथ, पर्व हमको सिखलाता।
जो आए दरबार, उसे सुख देना माता।।

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