मापनी-
221 2122 221 2122
अपदांत
समांत-
आए
ये
रात भी हसीं है चंदा भी’ मुस्कुराए।
चंदा
व चांदनी से धरती भी’ जगमगाए ।।
है
हौसले न कम पर सागर भी’ छू न पाए।
कैसा जुनून है यह, मन जो रहे न काबू,
बेमौत
ही पतंगा तो जान तक गँवाए।।
इनसान
भी कहाँ है पीछे रहे यहाँ पर,
जिसने
मुहब्बतें कीं, इतिहास हैं बनाए।
‘आकुल’
न कर सका यह इसका न रंज उसको,
क्यों
रूप रँग बदलता नित राज़ ये बताए ।।

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