13 अप्रैल 2018

मेरे हिस्‍से धूप कड़ी हो (गीतिका)

छंद- लावणी
शिल्‍प विधान- मात्रा भार-30. 16,14 यति अंत गुरु से
पदांत- मिले
समांत- आँव

मेरे हिस्‍से धूप कड़ी हो, तुझको कोमल छाँव मिले.
मेरे हिस्‍से सख्‍त जमीं हो , तुझको रेशम ठाँव मिले.

मधुबन सी सुरभित हो जीवन, बगिया तेरी हरी-भरी,
कविता गाती मिले कोकिला, क्‍यों कौए की काँव मिले.

ईश्‍वर ने जब रूप दिया है , कोमल फूलों के जैसा,
कोमल पथ ही मिलें न घायल, क्‍यों कोई भी पाँव मिले. 

क्‍यों चाहूँ वह प्रीत ते’री जग, जिसका कोई मोल रखे,
मिले मुझे तू निश्‍छल निष्ठित, नहीं कभी भी दाँव मिले.

प्‍यास बुझे यह नहीं जरूरी, बनी रहे अभिलाषा सी,
मुझको मृगमरीचिका में भी, ‘आकुल’ इक नँदगाँव मिले.

12 अप्रैल 2018

उड़ चलें हम कल्‍पना के लोक में (गीतिका)

छंद- गीतिका
2122 2122 2122 212
पदांत- सँग
समांत- आर

उड़ चलें हम कल्‍पना के लोक में दिलदार सँग.
हो सके घर ले चलें सब भूल के इक बार सँग.

पंख गुब्‍बारे बनें अरु घर भी पुष्‍पक सा बने,
ले चले मलयज पवन हमको उड़ा उस पार सँग.

जो परी के देश आयें बीच में मिलते चलें,
जो सुना जाती थीं’ लौरी रात में मनुहार सँग.

वो भी’ क्‍या दिन थे न उड़ने से कभी भी खौफ़ था,
चाँद की बारात में पहुँचे थे हम अधिकार सँग.

रात काटें यदि कहीं मिल जाये हमको चाँदनी,
जा सकें मेहमान बन कर चाँद के दरबार सँग    

स्‍वप्‍न सच करना है तो जाओ चुनो इक राह तुम,
दौड़ना मंजिल मिलेगी वक्‍त की रफ्तार सँग

प्रेम का संदेश पहुँचायें क्षितिज तक लो चलो,
पा सको तो जीत लो मन उड़ सकोगे प्‍यार सँग.  
  

11 अप्रैल 2018

एक समय था (मुक्‍ता माला-1)

मुक्‍तक
एक समय था तप, उपासना, योग, शांति के थे सुख साधन.
धरती पर थे खूब सघन वन, गुरुकुल संकुल, थे गोचारण.
पर विकास के पथ पर चल नीरवता खोई सबसे पहले, 
जबसे हमने छला प्रकृति को खोया है हमने अपनापन.
मुक्‍तक
एक समय था घर, परिवार, समाज, सभी थे अनुशासन प्रिय
अपने-अपने उत्‍तरदायित्‍वों, कर्तव्‍यों में थे सक्रिय.
पर जबसे घर की लाँघी है लक्ष्‍मण रेखा हुए अकेले,
सक्रिय हुई शक्तियाँ कलुषित पड़ी हुई थीं अब तक निष्क्रिय.
मुक्‍तक  
एक समय था दोहा, चौपाई, कवित्‍त का खूब चलन था.
छंद शास्‍त्र निष्‍णात सुकवि थे, हर फन का स्‍वच्‍छंद गगन था. 
चाटुकारिता, व्‍यंग्‍य, हास्‍य समृद्ध हुए आयोजन अब तो,
मुक्‍त छंद कविताएँ भी नाचें जहाँ छंदों का बंधन था.
मुक्‍तक
एक समय था प्रकृति शांत थी, शांत ही था तन में जठरानल.
आज विषैले हुए आदमी जीते हैं पी कर हालाहल.
वायु प्रदूषण, शोर प्रदूषण, बढ़ते, नित साधन-संसाधन,
धरती से आकाश तलक पहुँचा है तकनीकी कोलाहल.
मुक्‍तक
एक समय था घर का ही भोजन करते थे मिल जुल कर ही.
भोजन भी स्‍वादिष्‍ट हुआ करता था, खाते थे ससमय ही.
पर जब से बाहर बाजारों में खाने का शौक लगा,
चरते है पशुओं की भाँति हम सब दिन भर चाहे जब ही

8 अप्रैल 2018

जीवन से जो मिला विष-अमृत (गीतिका)

छंद- लावणी
शिल्‍प विधान- मात्रा भार 30, यति 16,14 अंत गुरु वाचिक.
पदांत- मन
समांत- आरा

जीवन से जो मिला विष-अमृत, बाँट रहा है सारा मन.
उम्र कैद का दण्‍ड जन्‍म से, काट रहा है कारा मन.

तर्पण कर भी भ्रष्‍ट कर्म के, पाप कहाँ धुल पाते हैं
आज गया कल हरिद्वार का, घाट रहा है हारा मन.

कुछ खो कर, पाने से मिलती खुशियाँ थोड़ी बहुत मगर,
कुछ पा कर खोने की पीड़ा, छाँट रहा है न्‍यारा मन.

सहिष्‍णुता कापुरुष सरीखी, लगती है अब नारी की,
शिक्षा से इस कमियों को भी, पाट रहा बंजारा मन  

मानव ने कब अपनी हठ को, छोड़ा है युग हैं साक्षी
मर कर लेता जन्‍म रहा है, ऐसा है आवारा मन.