13 जून 2018

गर्मी में अब तो गरम होती है हर भोर ( गीतिका)

छंद- दोहा


गर्मी में अब तो गरम, होती है हर भोर.
रातों में लू की तरह, हवा मचाये शोर.

बीतें ले कर करवटें, अकुलाहट में नित्‍य,
रातें जगते ही कटें, जैसे जगते चोर .

सोच सोच कर है दुखी, फिर किसान इस बार,
भीषण गर्मी सी नहीं,  हो वर्षा घनघोर.

मौसम के लगते नहीं, हैं अच्‍छे आसार,
बेमौसम बरसात पर, चलता किसका जोर.

प्रकृति वल्‍लभा की दशा, देख सूर्य का तेज,
नीलगगन भी मौन है, व्‍याकुल धरा कठोर.

पवन झकोरा आएगा, गुजर जाए'गी रात,  
मौसम से टूटे नहीं, बस जीवन की डोर. 
 
चल ‘आकुल’ ऐसा करें, प्रकृति रहे खुशहाल,
कण-कण वसुधा का फले,  महके चारों ओर.  

8 जून 2018

गर्मी का आनंद उठायें इस मौसम में (गीतिका)

छंद- चौपाई + चौपाई की अर्द्धाली, 16, 8 पर यति
पदांत- इस मौसम में
समांत- आएँ (उकारांत)


चलो चलो सब मौज उड़ाएँ इस मौसम में. 
गर्मी का आनंद उठायें इस मौसम में.

हर मौसम के होते सुख-दुख अपने अपने,
एक एक कर खुशी जुटायें इस मौसम में.

गोले, कुल्‍फी, फालूदा, ठंडाई, चुस्‍की,
सौ दौ सौ का नोट तुड़ायें इस मौसम में.

खरबूजा तरबूज फालसे खिरनी लायें,
मंडी जा कर आम तुलायें इस मौसम में.

इस मौसम में आम न खाया तो क्‍या खाया,
सब मित्रों को आम चुसायें इस मौसम में. 

कूलर, एसी, छाया, पंखा, ठंडा पानी,
ना हों छक्‍के खूब छुड़ाएँ, इस मौसम में.

जाते जाते गरमी को भी भेंट करें सब,
मिलजुल कर सब पौद उगायें इस मौसम में.

फल का राजा आम, आम जनों का राजा,
नहीं आदमी आम भुलाएँ इस मौसम में.

2 जून 2018

एक समय था (मुक्‍तक माला- 3)

मुक्‍तक
एक समय था, हुई शाम चौपालें सजती थीं गाँवों में.
दुख-सुख के चर्चे होते, बरकत भी रहती थीं गाँवों में, 
था जुड़ाव पशुधन से घर के प्राणी जैसे वे रहते थे ,
धरा, प्रकृति, खलिहान, खेत से थाती बनती थी गाँवों में.
मुक्‍तक
एक समय था, था महत्‍व गावों में पशुधन का घर-घर में.
थे अनुकूल प्रकृति से सारे, विधि-विधान साधन घर–घर में.
आज मगर तकनीकी साधन-संसाधन के हुए अतिक्रमण, 
पशुधन हैं आवारा पहुँचा तकनीकी ईंधन घर-घर में.
 मुक्‍तक
एक समय था गाँवों में था प्रकृति प्रदत्‍त सभी सुख वैभव.  
ताल ,सरोवर, कुंड, कुए, बावड़ि‍यों से था प्रचुर जलोद्भव.
हरी भरी खेती, वन, उपवन, पशुधन सब पर्याप्‍त सुगम थे,
मानव के दिन रात प्रकृति के संग गुजरते थे हर संभव.
 मुक्‍तक
एक समय था क्रय विक्रय की अनुपम विधि थी सब गाँवों में.
बदले में अनाज के चीजें मिल जाती थीं सब गाँवों में,
हर सप्‍ताह हाट लगते थे, रौनक मेले सी होती थी,
सीमित आवश्‍यकतायें थी, संतोषी थे सब गाँवों में.
 मुक्‍तक
एक समय था, शिक्षा के, सोपान न चढ़ पाती थी नारी.
घर की ड्योढ़ी के ही भीतर, उम्र खपा देती थी नारी.
पर सर्वस्‍व निछावर कर,  धरती के लाल दिये नारी ने,
संस्‍कार की धूप में तप कर, कुंदन बन जाती थी नारी.
मुक्‍तक
एक समय था मर्यादाओं, में बँधकर रहती थी नारी.
बेटे-बेटी में अंतर को, घुट घुट कर सहती थी नारी.
आज जहाँ बेटी ने जग में, चहूँ दिशा ध्‍वज फहराया है,
यह नारी के तप का है, परिणाम धैर्य रखती थी नारी


22 मई 2018

परियों के दशे से क्‍या धरती पे आ रही है (गीतिका)


छंद- दिग्‍पाल/मृदुगति
मापनी- 221 2122 221 2122
पदांत- रही है
समांत- आ

परियों के’ देश से क्‍या धरती पे’ आ रही है
इतना बता ए’ तितली हमको तू’ भा रही है

तेरे हैं’ पंख इतने सुंदर व रँग बिरंगे,
इठलाती’ नाचती तू क्‍या गीत गा रही है.

हर फूल से लगा क्‍यों रिश्‍ता ते’रा पुराना,
फूलों से’ अंग लग कर गुलशन से’ जा रही है.

है कौन वो चितेरा, जिसने तुझे सजाया ,
उसकी कला गजब तेरे तन पे’ ढा रही है;

जब सुन चुकी पलट के बोली वो’ मुस्‍कुरा कर,
सौग़ात ये प्रकृति की धरती से पा रही है.

संदेश मैं प्रकृति का आई यहाँ बताने,
मानव  की’ बेरुखी ही धरती को’ खा रही है.

खो जाउँगी न भू पर यदि स्‍वच्‍छता रहेगी,
इस डर से ति‍तलियों में मायूसी’ छा रही है.