16 अक्टूबर 2017

प्रख्‍यात वार्णिक छंदों पर रचनायें

किरीट सवैया (भगण X 8)
211 211 211 211 211 211 211 211
चाह नहीं कि भरा घर हो धन-दौलत नौकर-चाकर हो प्रभु.
चाह नहीं कि बराबर हो मुझ सा न कहीं घर-बाहर हो प्रभु.
चाह यही प्रभु 'आकुल' की न कदापि निरादर हो उस से बस,
चाह यही कि जरा-तन से बस दानवता न उजागर हो प्रभु.

छंद - " मदिरा सवैया " (वर्णिक ) मुक्‍तक
211 211 211 211 211 211 211 2
1+1=2 वर्जित है
[सात भगण (s।) + गुरु]
चाह नहीं कि भरा घर हो धन-दौलत नौकर-चाकर हो.
चाह नहीं कि बराबर हो मुझ सा न कहीं घर-बाहर हो.
चाह यही प्रभु 'आकुल' की न कदापि निरादर हो उस से,

चाह यही कि जरा-तन से बस दानवता न उजागर हो.


24 घनाक्षरी// मनहरण कवित्‍त (वार्णिक)
विधान- 8,8,8,7, पूर्ण वर्णों की गणना ही.
1
भोर भई लाली लख, नीड़ सौं छूटें है खग
भयो चहुँ ओर रव, आज होरी आई है.
ग्‍वाल बाल श्‍याम संग, लिये पिचाकारी रंग
झाँझ अलगोजा चंग, बाँसुरी बजाई है.
नारि नर अटारी सौं, द्वार सौं तिबारी सौं
रंग कूँ उड़ाय चले, गारी भी सुनाई है.
गाय के धमार छंद, साँवरे आनंद नंद
रंग में रँगाय के दी, होरी की बधाई है. 
2
सारौ बिंदावन धाम, गोकुल व नंदगाम
और बरसाने की तो, होरी जो मनाहि है
रेणु भी अबीर बने, कालिंदी को तीर बनै
ब्रजबासिनों के संग, होरी जो खिलाहि है
बड़भागी बने कोय, जनम सफल होय
फल गोलोक सो जन्‍म, धन्‍न ही बनाहि है   
आज भी कहें पथिक, होरी के सभी रसिक
नारिन में बिरज की, राधा ही समाहि है.


छंद - मत्तगयंद सवैया (वार्णिक छंद )
शिल्प विधान- 7 भगण +22
मापनी - 211 211 211 211 211 211 211 22

(उक्त छंद में गुरु के स्थान पर दो लघु की छूट नहीं होती है।)

1
पीर हि पीर ब सी मन  में, कछु  सूझत  नाहि क हूँ कछु  द्वारे.
नंदकुमार हमार सखा, बहु साथ रहे सँग साँझ सकारे.
जाय कहो नट नागर सौं हम विप्र सुदाम हुँ मित्र तुम्‍हारे.
बाँध कठोर कियो मन जाय कही मुख द्वारहुँ जाय के ठारे
2
जौंहि कहौ कि सुदाम खड़े झट लेउत्‍तरि बेगहिं किलकारे
दौरि परे सुन मित्र सुदाम सुँ द्वारहि आकुल बाँह पसारे.
बोल सके न कछू उर भींच सुदाम भि बोल सकै कछु नारे
देख भये चकिताचित द्वार हुँ रानिजु रुक्मिनि कौन पधारे.

14 अक्टूबर 2017

पत्‍थर दिल भी गाना सीख ले



छंद- गीतिका
मापनी- 2122 2122 2122 212
पदांत- सीख ले
समांत- आना

डर न सबको साथ ले तू डर भगाना सीख ले.
जो नहीं डरता उसी का है जमाना सीख ले.

फूल ने क्‍या शूल से डर कर न दी खुशबू कभी, 
कंटकों की राह में तू पग जमाना सीख ले.

दु:ख दे जाता न हँसने की सज़ा अकसर हमें
बीच में बच्‍चों के’ रह कर खिलखिलाना सीख ले.

चाह छूने की गगन को, वो जमीं से बेखबर,
तू जमीं बंजर न हो पौधे लगाना सीख ले.     

मेघ बरसें पर्वतों पे वन घने बसते स्‍वयं
प्‍यार यूँ बरसे कि पत्‍थर दिल भी’ गाना सीख ले.

12 अक्टूबर 2017

मन अगर मन का करे (गीतिका)



छंद- गीतिका 
मापनी- 2122 2122 2122 212 
पदांत- सीख ले 
समांत- आना 
 
मन अगर मन का करे तो हर बहाना सीख ले.
फूँक कर देखे तमाशा घर जलाना सीख ले. 

मनचला कोई परिन्‍दा, तो नहीं मन जान ले,
जा उड़े आकाश पर वह, पर चलाना सीख ले.

दृढ़ अगर व्‍यक्तित्‍व करना है अकेले कर भ्रमण,
मौन रह कर दौड़ते मन, को बचाना सीख ले.

साँस क्‍यों मंथर चले इसका समझ ले राज़ तू
धैर्य से जीवन बिता मन, को मनाना सीख ले.

फिर भी’ मन भटका करे जो, शांति की हो चाहना
जा शरण में तू प्रभू के, लौ लगाना सीख ले.

11 अक्टूबर 2017

कहीं ईश्‍वर या अल्‍लाह होता अवश्‍य है (गीतिका)



पदांत- होता अवश्‍य है 
समांत- आह

साहस का उत्‍स, उत्‍साह, होता अवश्‍य है.
जीवन में, इसका प्रवाह, होता अवश्‍य है.  

कभी उत्‍साह, को हम माप, तो सकते नहीं
समय  पर, इसका आगाह, होता अवश्‍य है.  

सुख और, दुख उत्‍साह के, ही पहलू हैं दो,
नहिं चाह, कर भी निर्वाह, होता अवश्‍य है.  

पूर्ण तो कोई, नहीं जीवन में, इसीलिए,
कभी उत्‍साह, में गुनाह, होता अवश्‍य है.
 
पूर्णता का, मार्ग है यह, शौर्य का है रूप,
कर्म में छिपा, बेपनाह, होता अवश्‍य है.

एकजुट, होने का श्रेष्‍ठ, भाव है उत्‍साह,
उद्देश्‍य प्राप्ति, का गवाह, होता अवश्‍य है.
  
पर्व का, उत्‍साह ही, देता है नव ऊर्जा,
हर उम्र में, इक उत्‍साह, होता अवश्‍य है.   

कभी कमी, न आने दो तुम, इस उत्‍साह में,
उत्‍साह, जीवन की राह, होता अवश्‍य है.

उत्‍साह में, छिपा यह मर्म, जान लो ‘आकुल’,
कहीं ईश्‍वर, या अल्‍लाह, होता अवश्‍य है.

10 अक्टूबर 2017

नारी का अपमान न हो वो सुहाग बना (गीतिका)

पदांत- बना 
समांत- आग 

जीवन का उत्कर्ष, प्रेम और त्याग बना.
सर्वधर्म समभाव सब से, अनुराग बना.


मोह, माया, मत्सर से, नहिं हो, तू प्रेरित,
जीवन बहु-सुखाय, बहु-हिताय, प्रयाग बना.

तीव्र दावानल, बड़वानल से, जठरानल,
जीवन जले न, कुछ ऐसा ही, सुराग बना.

भ्रष्ट, अपकर्ष, निकृष्ट, प्रदूषित भाव सभी,
जल कर, सोना बने विशुद्ध, वो आग बना.

देव अर्द्धनारीश्वर, में ही' अब, पुजें सदा,
नारी का, अपमान न हो, वो सुहाग बना.