8 अक्टूबर 2017

गढ़ी गीतिका मित्र (गीतिका)



पदांत- गीतिका मित्र
समांत- अढ़ी

मात्र मापनी में नहीं, गढ़ी गीतिका मित्र.
सहज और स्‍वच्‍छंद थी, पढ़ी गीतिका मित्र.

कथ्‍य शिल्‍प में जान थी, पैठी मन में बात,
नहीं एक विद्वान् सर, चढ़ी गीतिका मित्र.

मिली वा-वाह भी बहुत, पर वे थे बस मौन,
इसी हठाग्रह की वजह, चिढ़ी गीतिका मित्र.

थे हिंदी के शब्‍द सँग, प्रचलित उर्दू शब्‍द,
ले खटास मन में बनी, कढ़ी गीतिका मित्र.

अलग-थलग होने लगी, रचनायें स्‍वच्‍छंद,
छंद किताबों में रही, मढ़ी गीतिका मित्र. 

रचनायें आधार हों, नहीं छंद से बैर,
न हो दुराग्रह से जली, कुढ़ी गीतिका मित्र

अब स्‍वच्‍छंद गगन उड़ी, लेकर युग्‍म प्रवीण,
’मुक्‍तक लोक’ विधान से, बढ़ी गीतिका मित्र 

7 अक्टूबर 2017

यह चला चली की है दुनिया (गीतिका)



छंद-द्विगुणित पदपादाकुलक (राधेश्‍यामी) चौपाई
विधान- 16,16 आदि गुरु एवं अंत दो गुरु, द्विकल से आरंभ तो 
बाद में दो त्रिकल या दो चौकल हों तो अच्‍छा.
(लय- उठ जाग मुसाफिर भोर भई, अब रैन कहाँ जो सोवत है)    
पदांत- की है दुनिया
समांत- अली

तेरा-मेरा क्‍या है प्राणी, यह चला चली की है दुनिया.
तू चपल बने या चपला बन, यह बाहुबली की है दुनिया.

सीधे का यह संसार नहीं, सब अवसरवादी फलते हैं,
यदि चाटुकारिता दाँव खबर, ये’ विरुदावली की है दुनिया.

मदनोत्‍सव हों दिन रात जहाँ, हों संत समागम जलसों से
हे लोकतंत्र की लाठी से,  अदला बदली की है दुनिया  

सबका अपना व्‍यापार चले, बस उँगली उठे न धर्मों पर,
मंदिर मस्जिद गुरुद्वारों की, रख रखावली की है दुनिया.

युग युग से हारा है मानव,  जब भी त्रिनेत्र का नेत्र हिला,
विध्‍वंस किया है’ प्रकृति का जब, उसने खाली की है दुनिया.  

5 अक्टूबर 2017

कर्म कीजिए सभी (गीतिका)

गीतिका 
छंद- द्विगुणित समानिका
मापनी- 21 21 21 2 // 21 21 21 2

कर्म कीजिए सभी, कर्म को न त्यागना.
कर्म ही तो' धर्म है, कर्म है उपासना.

लाभ-हानि-भाग्य सब, कर्म से जुड़े हुए,
कर्म जीत-हार है, कर्म से न भागना.

जन्म का भी' हेतु है, कर्म-चक्र से बँधा,
धर्म-चक्र से बँधी, व्यक्ति की स्‍व भावना.

सूर्य-चंद्र, रात-दिन, दु:ख-सुख, जनम-मरण,
कर्मगति के’ फल हैं' सब, जीतना व हारना.

इसलिए न जिंदगी, दाँव पर लगाइये.
कर्मनिष्ठ बन के’ ही, भाग्य को सँवारना.

4 अक्टूबर 2017

पत्‍थर सा कठोर तन ले कर जीना होगा (गीतिका)

पदांत- होगा
समांत- ईना


पत्थर सा कठोर तन ले कर, जीना होगा.
प्रकृति से प्रदूषित हालाहल, पीना होगा.

हरित पीत वस्त्राभूषण वर्षा पर निर्भर,
है मनुष्य यदि मौन, मौन ही, जीना होगा.

घाव दिये हैं, शहर, गाँव, पथ, पगडंडी को,
नासूरों को अब कंटक से, सीना होगा.

स्वच्छ रहें पथ,गाँव,श्‍ाहर सब, नदियाँ, नाले ,
रोम-रोम, रग-रग, मेरा भी, भीना होगा.

वृक्षारोपण हो धरती हो, हरी-भरी फिर,
क्यों पत्थर से छलनी मेरा, सीना होगा.

3 अक्टूबर 2017

विलोम शब्‍द मुक्‍तक- अनिवार्य/ऐच्छिक

छंद- सरसी 
(विधान- चौपाई की अर्द्धाली+दोहा का समचरण 16,11 पर आधारित मुक्‍तक द्वय.)

अनिवार्य
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शब्द पतन नहिं मान्य छंद हैं, ऐसे भी कुछ एक.
जो ज्ञानी निष्णात गुणी हैं, मिलते हैं कुछ एक.
गुरु, लघु भी अनिवार्य छंद में, कुछ ऐसे हैं छंद,
पर स्वच्छंद छंद भी दिल को, छूते हैं कुछ एक.
ऐच्छिक
======
हो समांत हो पदांत तो ही, बने गीतिका रूप.
गुरु-लघु ऐच्छिक नहीं बनाता, छंद विशेष स्वरूप.
बिना ज्ञान कोशिश करना भी, करता श्रम बेकार,
होता है सिरदर्द करें श्रम, हो सिर पर ज्यों धूप.

2 अक्टूबर 2017

बापू की राह अहिंसा की (गीतिका)


छंद- द्विगुणित पदपादाकुलक (राधेश्‍यामी) चौपाई
(विधान- 16, 16 आरंभ गुरु व अंत 2 गुरु से. द्विकल के बाद 2 चौकल)
पदांत- हैं
समांत- अलते

(लय- उठ जाग मुसाफिर भोर भई, अब रैन कहाँ जो सोवत है)    

बापू की राह अहिंसा की, जन-जन हिंसा में पलते है.
रातें बेचैनी में कटती, नित दहशत में दिन ढलते हैं.

पहचान नहीं कपड़ों से हो, पहचानें सब चरित्र से ही,
बापू के ये अनमोल वचन, उम्‍मीदों को बस छलते हैं.

है आज अहिंसा दिवस मगर, नहिं संभव हो न कहीं हिंसा,
कब पूरे शिक्षित होंगे हम, यह स्‍वप्‍न हमें अब खलते हैं.

जब जात-पाँत, आरक्षण हो, हो राजनीति जब वोटों की,
अपना-अपना जब स्‍वार्थ पले, संधान प्रगति के टलते हैं.

हे बापू, तेरा भारत अब, जब-तब ही करता याद तुझे,
कुछ ही गाँधीवादी हैं जो, तेरे रस्‍ते पर चलते हैं.    

1 अक्टूबर 2017

हो राम सीताराम तुम (गीतिका)


छंद- हरिगीतिका
मापनी- 2212 2212 2212 2212
पदांत- तुम
समांत- आम

हो राम, सीताराम तुम, हो कृष्‍ण, राधेश्‍याम तुम.
दशरथ सुनंदन राम तुम, वसुदेव के घनश्‍याम तुम.

अग्रज लखन के थे तुम्‍हीं , बलराम के तुम थे अनुज,
कोशल अधिप श्रीराम तुम, जसुमति प्रथम नितनाम तुम.

तुमसे पुरी कहते अवध, ब्रजभूमि ही गोलोक है,
वाराह, कच्‍छप, कूर्म, मत्‍स्‍य, नृसिंह परशूराम तुम.  

हो कल्कि वामन, बुद्ध के तुम रूप हो विधना तुम्‍हीं,
तुम पंचभूतों में बसे कण-कण महा आयाम तुम.

तुमसे चले ब्रह्माण्‍ड यह, तुमसे चराचर है जगत,   
अवतार तुम नारायणा, हो विश्‍व का परिणाम तुम.