27 अप्रैल 2026

कहता रहा मन बाँध ले, गठरी चलें अब गाँव

 गीतिका 
छंद- मणिमाल
मापनी- 11212 11212 11212 1121
अपदांत
समांत- आँँव

कहता रहा मन बाँध ले, गठरी चलें अब गाँव।
शहरी नहीं अपने सगे, सब व्यर्थ के हर दाँव।

हर बात पे अहसान की, छवि झूठ के दस बोल,
बिन पेड़ के पथ दूर तक, मिलती नहीं कुछ छाँव।

कम बोलतीं पिक और हैं, कम हो रहे खग शोर,
हर ओर कूकर साँड के, जमने लगे अब पाँव।

इतना लगा बिन वृक्ष ही, सब आज के परिणाम,
कल धूप भीषण हो मिले, चल छोड़ के अब ठाँव।

मत छोड़ के घर बार जा, यह ही है ‘आकुल’ स्वर्ग
समझे न क्यों तब काक था, कहता रहा कर काँव।

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