गीतिका
छंद- विधाता
मापनी- 1222 1222 1222 1222
पदांत- से
समांत- आने
न
बागों ने कभी की है शिकायत ही जमाने से।
सदा
महके प्रकृति से पा हवा पानी व दाने से।
बुलाया
कब शजर ने आदमी को छाँव में अपनी,
न
तरुवर ने कभी रोका किसी को पास आने से।
नहीं
इनसान दे पानी हवा या खाद बागों को,
उन्हें
पावस पिलाते हैं अमिय खुल के खजाने से।
अगर
करता रहे रक्षा सदा पेड़ों व बागों की,
सदा
राहत मिलेगी आपदाओं में बचाने से।
नहीं
रहना है निर्भर आज हैं हालात बारूदी,
वही
इनसान है सम्हले तुरत आगाह पाने से।।
कभी
बैठे रहे भूलो इसे, पर अब उठो जागो,
चले
बिन मंजिलें मिलती, नहीं बातें बनाने से।।
न
हो कल भी हमारा जंग के हालात के जैसा,
यही
वो आग है ‘आकुल’ भड़कती है बुझाने से।।
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