22 अप्रैल 2026

पेड़ बचाएँ नही छोड़ना, उनको अपने हाल पर

गीतिका

छंद- मरहट्ठा माधवी

विधान- 29 मात्रीय छंद जिसमें 16, 13 पर यति अंत 212 (रगण) अनिवार्य।

अपदांत

समांत- अर

लेते हैं साँसें ये भी अरु, देते हैं नि:श्वास भर।

पेड़ बचाएँ नही छोड़ना, उनको अपने हाल पर।


हरियाली या हरित चित्र जैसा भी तुम बस ढाल लो,

वृक्ष झूमते हैं हर झौंके पर हो तो यह ध्यान धर।


करें समर्पित तन मन रोम-रोम अपना ये धरती को,

नंदनकानन यही बनाते हैं निसर्ग, संथाल, घर।


विकसित मरुउद्यान करें ये, ही यदि हम सब सोच लें।

हर प्राणी पाले इनको हम, जैसे पालें जानवर।


आकुलकी है सोच यही बस पेड़ों का संरक्षण हो,

श्रीगणेश कर भृगु, दुर्वासा, ऋषियों का आह्वान कर।।

- आकुल


भृगु ऋषि- ये नदियों और वनस्पतियों के रक्षक माने जाते हैं

ऋषि दुर्वासा- ने कल्पवृक्ष की रक्षा के लिए उसके नीचे बैठ कर तपस्या की थी।

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