गीतिका
छंद-
वसंत तिलका (वार्णिक)
मापनी
221
211 121 121 22
पदांत-
उनका नसीबा
समांत-
अलते
जिद्दी
नहीं पिघलते उनका नसीबा।
आँखें
सदा बदलते उनका नसीबा।
होते कई
गुनहगार न मार से भी,
बोलें न
ही बहलते उनका नसीबा।
खर्चे करें अधिक है कम आय तो भी,
ले ले उधार पलते उनका नसीबा।
बैठे रहें पर नहीं रुकती जुबाँ है ,
बोले बिना न चलते उनका नसीबा।
ना हो सही समय ‘आकुल’ छूट जाते,
मौके कभी फिसलते उनका नसीबा।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें