18 अप्रैल 2026

जी तू किसी भी तरह ज़ि‍न्‍दगी

गीतिका
छंद- विध्‍वंकमालिका (मापनी युक्‍त मात्रिक छंद)
मापनी- 221 221 221 2
पदांत- ज़ि‍न्‍दगी
समांत- अह

जी तू किसी भी तरह ज़ि‍न्‍दगी ।
हो ना ख़तम बेवजह ज़ि‍न्‍दगी ।

रख आस चल तू अकेले यहाँ ,
होगी कभी तो फ़तह ज़ि‍न्‍दगी ।

हो या न हो कारवाँ, दोस्‍त हों,
हो ख़ुशनुमा हर सुबह ज़ि‍न्‍दगी ।

रिश्‍ते निभें ठीक, ना भी निभें,
जी ले तनिक कर सुलह ज़ि‍न्‍दगी ।

ना कर्ज़, ना मर्ज़, ना शत्रुता’,
’आकुल’ नरक है कुनह ज़ि‍न्‍दगी ।

कुनह- द्वेष, शत्रुता

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