गीतिका
मापनी- 222 222 222 // 22 22 22 22 2
जैसी करनी वैसी भरनी है।
काल परिस्थितियों से बननी
है।
मौसम के प्रतिकूल चले जो भी,
तबियत अकसर तभी बिगड़नी है।
कम खा गम खा हद में रहना ही,
वर्ना तो बस चिंता बढ़नी
हैं।
बस में है अपने केवल करना,
बाकी तो ईश्वर की चलनी है।
क्यों ना ऐसे जीवन जियें
सभी,
नहीं प्रकृति से कोई ठननी
है।।
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