6 जनवरी 2026

कभी क्‍यों खूूँँ खराबे में सने हाथ

 छंद- शास्त्र (मात्रिक)

मापनी- 1222 1222 1221
पदांत- हाथ
समांत- अने

कभी क्यो खूँ-खराबे में, सने हाथ।
भलाई के लिए कोई, बने हाथ।

न खाली बैठता कोई हुनरमंद,
न देना वक्त पे, तू बहकने हाथ।

न कर पाए भलाई तो न कर फिक्र,
बढ़ायेंगे जमाने में घने हाथ।

कभी जज्बात नेकी के न हों खत्म
सिला नेकी दिलाती सामने हाथ।

जहाँ में मौत आती वक्त बे वक्त,
चलें 'आकुल' किसी का साधने हाथ।।


20 दिसंबर 2025

दाँँतो को रखिए सदा, स्‍वच्‍छ दुर्गंधविहीन (कुंडलिया छंद )

 1
दाँतों को रखिए सदा, स्‍वच्‍छ दु्र्गंधविहीन।
खाएँ कटु, मिष्‍ठान्‍न कम,  कहें शास्‍त्र प्राचीन
कहें शास्‍त्र प्राचीन, अगर दातुन कर पाएँ। 
विषहर नीम बबूल, मसूढ़े स्‍वस्‍थ बनाएँ ।।
होना है नीरोग, रखें निर्मल आँतों को ।
और दुर्गंधविहीन, रखें सदैव दाँतों को ।।
2
ओने-कोने में फिरे, करे लार से नर्म।
लिपट-लिपट कर प्रेम से, करती अपना कर्म
करती अपना कर्म, भले ही निर्ममता से ।
दाँत रहें हर स्‍वच्‍छ, जीभ की कर्मठता से।
रहना उनके साथ, जिंदगी भर हैं ढोने।
करते ज्‍यों नित साफ, घरों के ओने-कोने ।।       

13 दिसंबर 2025

शरच्‍चंद्र

छंद- शंकर 
विधान- 26 मात्रीय छंद जिसमें 16, 10 पर यति 
अंत गुरु -लघुु (21) से।  

मुक्तक

ऐसा लगा नजदीक आया, और ज्यादा चाँद।

शरच्च्‍ंद्र बन कर हरसाया और ज्यादा चाँद।

सागर चॉंद के मिलन की फिर, बनी निशा गवाह,   

सागर को देख मुसकुराया, और ज्‍यादा चाँद।। 

12 दिसंबर 2025

माघ मास में

छंद- शक्तिपूजा 

खरमास खत्म होता है पहले माघ मास में। 
होते हर शुभ कार्य शुरू फिर, माघ मास में। 

मिश्रित कर के प्रतिदिन गंगाजल, स्नान करें,
पूजन करें लक्ष्मी विष्णु का, माघ मास में ।

परंपरा, है कल्पवास की, माह पर्यन्त, 
पढ़ें ग्रंथ गीतादि नित्य  ही, माघ मास में। 

सूर्यप्रवेश मकर राशि में, सरदी बढ़ाता, 
चरम पर होती है ऋतु शरद , माघ मास में ।

फलदायी है माघमास में दानपुण्य हो, 
आते हैं नवान्न घर-घर में, माघ मास में। 

यूँ तो हरिक दिन पर्व मनाता अपना देश 
पर्व बसंत लुभाता सबको माघ मास में ।।

 

2 दिसंबर 2025

तीन कुंडलिया छंद

 1
न्‍यारा कितना अर्थ है, बूझो तो इक बार ।
तीन अर्थ हैं शब्‍द के, स्‍पैलिंग इक सार ।।
स्‍पैलिंग इक सार, भिन्‍न तीनों के मतलब ।
शब्‍दों का संसार, करे कितने ही करतब ।।
वर्तमान है एक, दूसरा विद्युत धारा      
दे न, वसूले ब्‍याज, बैंक खाता है न्‍यारा ।।  
(उत्‍तर- करंट)

2
तप कर खरे सुवर्ण से, गहने बनें अनूप।    
जैसे लोहा बिन तपे, बदले नहीं स्‍वरूप ।।   
बदले नहीं स्‍वरूप, वही है सच्‍चा साथी।
कब श्‍वानों के बीच, हुए हैं विचलित हाथी।।
श्रमस्‍वेदों को भूल, धूप में तपता हलधर।
देती तृण, फल, पुष्‍प, धूप में धरती तप कर।।

3
बचपन सुनता देखता, लिखता वो ही बात।
जात-पाँत , जज्‍बात या, दीन-दुखी हालात।।
दीन-दुखी हालात, मिलें सस्‍कारों से ही।
बनती पन्‍ना धाय, बने कोई वैदेही।।
मिट्टी से ही मूर्ति, बनें मिट्टी से बरतन।
हो सत्‍यार्थ प्रकाश, निखर जाता है बचपन।।      


19 नवंबर 2025

कुंडलिया छंद दिवस पर कुछ कुंडलिया

आज कुंडलिया छंद दिवस की शुभकामनाएँँ। आज कुछ छंद इस दिवस को समर्पित   
1
धीरज कम इंसान में, रहे उग्र दिन रैन 
कम रखते वाणी मधुर, खोते सब  का चैन ।।
खोते सब का चैन, पड़ें उलझन में खुद भी ।
लेते झगड़े मोल, और खोते सुधबुध भी ।।
कह आकुलकविराय, पंक में पलता नीरज ।
सबका मिले निदान, रखे मानव जो धीरज ।।
2
मात पिता गुरु राष्ट्र ही, जीवन का आधार ।
पथ प्रशस्त करते यही, है इनसे संसार ।।
है इनसे संसार, सफलता चरण चूमती ।
मिलता मान अपार, विजयश्री संग घूमती ।।
इन्हें मान आदर्श, कार्य जो करते हैं शुरु ।
डिगते नहीं कदापि, धन्य वे मात-पिता-गुरु ।।
3
कर्मनिष्ठ का कर्म से, होता है उत्थान ।
अकर्मण्य के भाग में, सोता अभ्युत्थान ।।
सोता अभ्युत्थान, नहीं मंजिल को छूते,  
भाग्य और दुर्भाग्य, कर्म के ही बलबूते ।।
होता है सम्मान, यथा घर में वरिष्‍ठ को ।
दिलवाता सम्मान, कर्म ही कर्मनिष्ठ का ।।
4
धर्म-कर्म बिन जीव का,  जीवन पतन समान ।
जैसे गुरु बिन ज्ञान का, मोल मिले कम मान ।।
मोल मिले कम मान, चोर चाहे दे सोना ।
चोरी का लो माल, चैन घर का है खोना ।।
आँचल बिन अब शीश, आँख भी आज शर्म बिन।
शायद जीवन मूल्‍य, खो गए धर्म-कर्म बिन ।। 

18 नवंबर 2025

जीवन एकांकी भी तो है

जीवन खुश रहना ही तो है।
जीवन दुख सहना भी तो है।।

महलों के क्‍या ख्‍वाब देखना।
अपनों से क्‍या लाभ देखना।
कम से कम इतना ही हो  बस,
जीवन की मुस्‍कान देखना।

जीवन मन भरना ही तो है।
जीवन हठ करना भी तो है।।

चंचल मन ये रुका नहीं तो
हठधर्मी यदि झुका नहीं तो
होंगे दंगे भी फसाद भी,
कर गुजरेगा चुका नहीं तो

जीवन कुछ पाना ही तो है।
जीवन कुछ खोना भी तो है।

नभ में तो पतंग भी कटतीं
मेघावलिया तक भी फटतीं
तारे टूटें अंतरिक्ष में,
मान्‍यताऍ बढ़तीं कम घटती

जीवन सदाचार ही तो है।
जीवन अनाचार भी तो है।।

चरम पहुँचना ध्‍येय नहीं हो
द्वेष, क्‍लेश, स्‍तेय नहीं हो
परिभाषा सुख की आवश्‍यक,
दुख कैसा भी हेय नहीं हो।

जीवन एकाकी ही तो है।
जीवन एकांकी भी तो है।। 

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