गीतिका
#छंद_द्विगुणित_सिंह_विलोकित
विधान- 32 मात्रीय छंद सम मात्रिक छंद है, अर्थात् विषम और सम चरण 'सिंह विलोकित' है। इस चौपाई आधारित सिंह विलोकित छंद में गुरु से आरंभ एवं दो गुरु से एवं अंत दो गुरु के स्थान पर रगण (212) से करना अनिवार्य होता है। इस प्रकार सम व विषम चरण में इसका निर्वहन इसे लयात्मक बनाता है। त्रिकल से आरंभ तो त्रिकल 'गुरु लघु' (21) ही मान्य एवं त्रिकल के बाद त्रिकल या त्रिकल का संयोजन आवश्यक। चौपाई व राधेश्यामी चौपाई की लय से निखरती है गीतिका ।
श्रीगणेश हो, शुभारम्भ हो, संवत्सर में शुरूआत हो ।
प्रेम और सोहार्द बढ़े नित, क्यों विकल्प या व्यतीपात हो ।
मातु शारदे वरद हस्त हो, सत्य ही लिखे सदा लेखनी ,
लाग-लपेट न चाटुकारिता, जो भी कहना सही बात हो ।
होती है इक उम्र आदमी, पाए यदि कुछ मिले प्रेरणा ,
यदि कर्मों को पड़े तोलना, क्यों कदापि फिर पक्षपात हो ।
दिन दूनी अरु रात चौगुनी, बढ़ता बालक थाम हाथ को,
रहता है निश्चिन्त हो अगर, संरक्षण तो नहीं घात हो ।
पाया है उसको ग्रहण करो, ईश्वर का समझो प्रसाद यह,
नवसंचार करे अनमोल है, जैसे हर दिन शुभप्रभात हो ।।