छंद- सोरठा
विधान- दोहे का हूबहू विपरीत यानि 11, 13 पर यति।
अपदांत
समांत- ऊकारांत इए
गीतिका
फूले
मगर न श्वास, धीरे धीरे घूमिए।
मन
का बनें न दास, करना योग न भूलिए।
घर
में रहती शांति, मिल जुल कर हम यदि रहें,
रहती
कभी न भ्रांति, नहीं बड़ों से रूठिए।
बच्चे
वृद्ध जवान, घूमें नित्य शाम सुबह,
घूमें
उस दौरान, कई समस्या बूझिए।।
आता
सबका दौर, कभी न हारें उम्र से,
करना
यह भी गौर, खुशियों को बस ढूँढिए।
जीएँ
रख विश्वास, मरना शाश्वत सत्य है,
कर
जायें कुछ खास, फिर जीवन से छूटिए।।
सबका
रखना मान, सुख-दुख तो मेहमान हैं,
जिएँ
सदा यह जान, समदर्शी बन पूजिए ।।
छल
प्रपंच से दूर, ‘आकुल’ की यह सीख रह,
क्यों
कर तनिक सबूर, खुद से थोड़ा पूछिए ।।
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