पद-1
विधान- छंद शृंगार + पूरक पंक्ति सरसी एवं द्विपद सरसी (पृथक् तुकांत)
विधान- शृंगार- 16 मात्रा। आदि त्रिकल-द्विकल, अंत द्विकल-त्रिकल, अंत गुरु लघु
विधान- सरसी- मात्रा भार- 27; 16 (चौपाई)+11(दोहे का सम चरण) पर यति।
बने
अब ऐसा इक संसार।
जीवन
में सब सभ्य शिष्ट हों रख आचार विचार ।।
सौर,
पवन ऊर्जा जल-स्रोतों, खेती पर हो काम।
उपनिवेशिकाएँ
विकसित हों हर पथ के हों नाम ।।
वन
उपवन सुरभित संरक्षित हों अब हर संथाल।
दिव्यांगों
असहायों की हो समुचित सार सँभाल ।।
शिक्षा
संस्कृति, धर्म, पर्व पर दिखे सदा सद्भाव ।
‘आकुल’ जीवन का उद्देश्य हो, सर्वधर्म समभाव ।।
पद-2
विधान- छंद चौपई + पूरक पंक्ति सरसी एवं द्विपद सरसी (सम तुकांत)
विधान- चौपई- 15 मात्रा। आदि गुरु , अंत गुरु लघु से। चौपाई के अंत मे गुरु को लघु कर देने से यह छंद सिद्ध होता है, इसलिए लय चौपाई की।
विधान- सरसी- मात्रा भार- 27; 16 (चौपाई)+11(दोहे का सम चरण) पर यति।
हो प्रभु ऐसा इक संसार।
इक सपना वसुधैवकुटुँबकम का हो अब साकार।।
बँधें न बाँध जहाँ नदियों के,
तट हों तीरथ द्वार।
मिलें
न नदियाँ कलिमल लेकर, मिटे सिंधु का खार ।।
खेल,
योग व्यायाम, प्रशिक्षण, के हों ज्ञान विहार ।
हो अभिव्यक्ति
की स्वतंत्रता व आपस में सहकार।।
‘आकुल’
सर्वे भवन्तु सुखिन:, हो संकल्प विचार ।
सर्वधर्म
समभाव दिखे हर तीज और त्योहार।।
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