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24 मई 2026

मार्ग मध्यम ही करें सारे ग्रहण माँ शारदे

छंद- गीतिका
मापनी- 2122 2122 2122 212  
पदान्‍त- माँ शारदे
समान्‍त– अरण

पट नयन खोलूँ सदा कर के स्‍मरण माँ शारदे।
फिर करूँ खटकर्म सारे संस्‍करण माँ शारदे।

पुष्‍प अर्पण नित्‍य करता शांति का आह्वान भी,
हों प्रकृति के प्रति सजग यह मनहरण माँ शारदे ।  

जान कर अनजान बन कर हो न जाए कर्म जो,
चिह्न दे जाए अमिट कोई न व्रण माँ शारदे ।

पार भव सागर करूँ बस नाम लेकर आपका,
दो करूँ सत्‍कर्म ऐसा आचरण माँ शारदे।

लेखनी को धार दो, मैं लिख सकूँ रचना वही,
सब करें पढ़ कर जगत् में अनुसरण माँ शारदे।

आजकल सब हैं दुखी उलझे हैं मकड़जाल में,
मार्ग मध्यम ही करें सारे वरण माँ शारदे ।

आज ‘आकुल’ भी घिरा है बीच ऊहापोह में,

बच रहा हूँ आज तक ले कर शरण माँ शारदे। 
-आकुल
मध्यम मार्ग-गवान बुद्ध द्वारा दिया गया जीवन का एक संतुलित दृष्टिकोण है। यह किसी भी समस्या या जीवन शैली में "अति" (Extreme) से बचने की शिक्षा देता है।

23 मई 2026

कितना सबको समझाएँँ

 छंद- पद (चौपाई परिवार)
विधान- चौपाई + सार छंद से पूर्ति एवं शेष द्विपदियाँ सम तुकांत।

कितना सबको समझाएँ ।
ढाई आखर प्रेम सत्‍य है, क्‍यों स्‍वीकार न पाएँ ।।
नारी पर कैसे श्रद्धा हो, पढ़ी लिखी पतिताऍं ।
प्रेमाकर्षण वशीभूत हो, जाँ जोखिम में लाएँ ।।
जन्‍म दिया पाला पर गलती कहाँ हुई बतलाएँ ।
सुनी, पढ़ी देखी ऑंखिन से, डरा रही घटनाएँ ।।
नहीं सभ्‍यता कहती है यह, कब संस्‍कार सिखाएँ ।
चलें लीक पर भले नहीं पर, दीवारें ना ढाएँ ।।  
क्रोध मोह माया मत्‍सर सब, तन से चिपटे जाएँ ।
यदि प्रभु से नाता जोड़ो तो, पहले इन्हें हटाएँ ।।
बिगड़ें खान पान दिनचर्या, आती हैं बाधाएँ ।
प्रेम अगर निश्‍छल है ‘बाकुल’, सिद्ध करें गुण गाएँ ।।

जपो नित श्रीकृष्‍ण शरणं मम

 छंद- पद (चौपाई परिवार)
विधान- चौपई + सार छंद से पूर्ति एवं शेष द्विपदियाँ सम तुकांत।
जपो नित ‘श्रीकृष्‍ण शरणं’ मम ।
ध्‍यान लगाओ, समय निकालो, कभी नहीं बिगड़े क्रम ।।
समय लगे भारी जब तब जप, अष्‍टाक्षर करता कम ।
कभी रहे विचलित मन जिसका, बैठे संत समागम ।।
दिनचर्या में रखो समय कुछ, साधो मौन नियम यम ।
सोचो समझो करो तभी कुछ, कभी न पालोगे  भ्रम ।।
भजते रहना यह अष्‍टाक्षर, लगे न इसमें दम-खम ।    
भाव रखो सेवा का ‘आकुल’ , नहिं विकल्‍प है दोयम ।।

22 मई 2026

जिस पर बीती मित्र, आफतें वह ही जाने

छंद- रोला

अपदांत

समांत- आने

 

जिस पर बीती मित्र, आफतें वह ही जाने। होनी टले न घात, कह गए सभी सयाने। बिल्ली काटे मार्ग, कहीं पर रोये कुत्ता, छींकें जाते वक्त, अपशगुन है पहचाने। बोले काक मुँडेर, अतिथि या खबर मिले शुभ, दिखे सगर्भा नार, अशुभ हैं घर से जाने। लप लप करती जीभ, साँप की भाँति किसी की, है ना करने योग्‍य, भरोसा, मित्र बनाने। 'आकुल' का है मात्र, यही कहना सब समझो, प्रकृति दत्त ये सीख, यूँ ही' दुनिया ना माने।

 

17 मई 2026

ये रात भी हसीं है चंदा भी’ मुस्‍कुराए

छंद- दिग्‍पाल (मानीबद्ध / मात्रिक)
मापनी- 221 2122 221 2122
अपदांत
समांत- आए

ये रात भी हसीं है चंदा भी’ मुस्‍कुराए।
चंदा व चांदनी से धरती भी’ जगमगाए ।।

देखे चकोर चाहे चंदा से हो मिलन अब,
है हौसले न कम पर सागर भी’ छू न पाए।

कैसा जुनून है यह, मन जो रहे न काबू,
बेमौत ही पतंगा तो जान तक गँवाए।।

इनसान भी कहाँ है पीछे रहे यहाँ पर,
जिसने मुहब्बतें कीं, इतिहास हैं बनाए।

‘आकुल’ न कर सका यह इसका न रंज उसको,
क्‍यों रूप रँग बदलता नित राज़ ये बताए ।।  

14 मई 2026

माँ की लीला अपरम्‍पार

 छंद- पद
इस पद का विधान- छंद चौपई + सरसी छंद से पूर्ति और शेष सम तुकांत में सरसी की द्विपदियाँ।

गायन / संगीत- राग सारंग अथवा राग रामकली

माँ की लीला अपरम्‍पार ।
कभी न थकती करती रहती, घर के काम हजार ।1।
सुबह सवेरे से लग जाती, मानी कभी न हार ।
सदा काम को पूजा समझा, पहले घर परिवार ।2।
ढाई आखर प्रेम लुटाया, कर सब कुछ निस्‍सार ।  
अतिथि देवोभव: समझ कर, सदा किया सत्‍कार ।3।
कुल कुटुम्‍ब का मान बढ़ाया, पाया सबका प्‍यार ।
‘आकुल’ बना उसी के दम घर, एक स्‍वर्ग का द्वार ।4।

13 मई 2026

माँ तो बस माँ जैसी होती

 माँ तो बस माँ जैसी होती ।

अमृत घोल पिलाया माँ ने ।
हाथों सदा झुलाया माँ ने ।
उँगली पकड़ चलाया माँ ने ।
रोने पर बहलाया माँ ने ।।

कभी नहीं वह धीरज खोती ।
माँ तो बस माँ जैसी होती ।।

किसने मोल किया है माँ का ।
इक अनमोल हिया है माँ का ।
नहीं तराजू बनी अभी तक,
जिसने तोल किया है माँ का ।  

फीके पड़ते हीरे मोती ।
माँ तो बस माँ जैसी होती ।।

नहीं मिला सुख माँ का जिसको ।
मिलती है सपनों में उसको ।
घर में इक तसवीर लगी हो,
देख न आँखें थकती जिसको ।।

माँ ही है केवल इकलौती । 
माँ तो बस माँ जैसी होती ।।   

11 मई 2026

मदिरा सवैया पर दो मुक्तक

छंद- मदिरा सवैया (7 भगण + गुरु)

मुक्तक-1
कर्म बिना कब शीर्ष मिला बिन कर्म कभी गति पा न सके।
शिक्षित ही समझे दुनिया बिन शिक्षक के मति पा न सके।
मूर्ख करे बस तर्क सुजान कभी न करे तकरार कहीं,
सत्य यही अति की गति भी तय कर्म करे यति पा न सके।

मुक्तक-2
जो भरता घर को शठ के दम मीत सुसंगति पा न सके।
जो करता खल संगत वो जग में सुख संप्रति पा न सके।
शीर्ष चढ़े वह वैभव में रह ‘आकुल’ का कहना भ्रम है,
जो धन के मद चूर रहे वह जग की सम्मति पा न सके।

यति– विश्राम; संप्रति- वर्तमान; सम्मति- अनुज्ञा, मत
भगण- 211 (गुरु लघु लघु)

10 मई 2026

माँँ तो केवल माँँ होती

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#मातृ_दिवस विशेष समारोह

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गीतिका

सर्वोपरि ममता में माँ।
धीरज में क्षमता में माँ।1।

बन्द सदा रखती मुट्ठी,
उत्तमता, समता में माँ।2।

साख बनाई बरकत से,
जीती कायमता में माँ।3।

मन मारा हरदम उसने,
खुश है मद्धमता में माँ।4।

माँँ तो केवल माँँ होती,    
सच की आगमता में माँ।5।

आगमता- प्रामाणिकता

3 मई 2026

मैया चंदा बहुत सताये

छंद- पद
विधान- मुखड़ा चौपाई एवं पूर्ति सार छंद (16। 16,12) से एवं शेष द्विपदियाँँ सार छंद (16, 12) में    

मैया चंदा बहुत सताये।
नित्‍य बदलता अपनी सूरत, जैसे मुझे चिढ़ाए।।
जाऊँ जहाँ वहाँ वह आता, पास कभी ना आए।
आज अभी तक मिला नहीं वह, क्‍यों कोई समझाए।।
चूम कपोल यशोदा गोदी, ले उर कंठ लगाए।   
बोली कान्‍हा, दूध पिला कर मैया उसे सुलाए।।
दूध पियो सो जाओ शायद, सपनों में मिल जाये।
प्रात देख बलिहारी माँ मुख-मंडल चंद्र सुहाये।।  

1 मई 2026

कभी जब मेघ बेमौसम बरस पानी बहाते हैं

गीतिका
छंद- विधाता
मापनी- 1222 12222 12222 1222
पदांत- हैं
समांत- आते

कभी जब मेघ बेमौसम बरस पानी बहाते हैं।
कहीं फसलें उजड़ती हैं कहीं मुसकान लाते हैं।1।

हवाएँ भी वजह बनतीं, न होती कम तपिश जब भी,
कभी इनकी बदौलत मेघ वापिस लौट जाते हैं।2।

न विक्षोभों न लू के ही थपेड़ों से मिली राहत,
कहीं तूफान बन जाते, कहीं दहशत बढ़ाते हैं।3।

हवा सूरज जमाने से अदावत पालते आए,
मगर ये मेघ ही हैं जो सदा आशा जगाते हैं।4।

चलो वृक्षों से करते हैं सभी अब मित्रता ‘आकुल’,
यही हैं जो हवा, सूरज व मेघों को झुकाते हैं।।5।।