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अलसभोर मन
तुम पे शोभता है
हर सिंगार हर वसन
गजरा हो या हार हो

फूलों का हो सजन
केतकी गुलाब
पारिजात गुलमोहर
रजनीगंधा रातरानी
जूही कनेर और
मोगरे की कली से
महकता हो बदन
जब न फूल हों
तो भी ढेरों सिंगार
फुलेल तेल इत्र से
महके रसवंती नार
घुँघटे में मुख कमल
आँखों में हो अंजन
चमक चाँदनी तुम्हारा
रूप ही बहार
भ्रमर गीत हो या
मधुमास का मनुहार
पलक पाँवड़े बिछाये
अलसभोर मन
सुन्दर शब्द संरचना से पुरुष प्रकृति को एकाकार कराती श्रंगारिक कविता ! बधाई !!
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