दोस्त फ़रिश्ते होते हैं.
बाक़ी सब रिश्ते होते हैं.
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14 मार्च 2012
शैफ़ाली
नाम है शैफाली जाने हयात का आँगन में है दरख्त पारिजात का।
फ़स्ले बहाराँ में वो रूठे रहे और मौसिम में सदा हँसते रहे दरख्त भी रूठा रहा इस मौसिम में वर्ना हर मौसिम में फूल झरते रहे अफसोस रहा मुझे बस इस बात का।
रातों में वो चहकती कचनार सी बातों में बहकती आबशार सी सुबुह थकी थकी जाने हयात वो ज्यूँ निसार हो शम्ए मज़ार सी अफसोस रहा मुझे हर इक रात का।
जब से नाम बदला है आई बहार नामकरण कर दिया है हरसिंगार सिंगार सी सजी सँवरी रहती है अब फूलों से लदी रहती है ज्यूँ बागो बहार अफसोस कहाँ मुझे अब इस बात का।
बढिया रचना, सुन्दर चित्र!
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर......................
जवाब देंहटाएंसादर.